Wednesday, March 20, 2024

संख्या 108 का रहस्य

 ॥ 108 ॥ का_रहस्य


॥ॐ॥ का जप करते समय 108 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है । 


॥ 108 ॥

यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय ( काल ) से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है।  


*★ आइये जाने संख्या 108 का रहस्य ★*


*स्वरमाला*


अ→1 ... आ→2... इ→3 ... ई→4 ... उ→5... ऊ→6 ... ए→7 ... ऐ→8 ओ→9 ... औ→10 ... ऋ→11 ... लृ→12

अं→13 ... अ:→14.. 

ऋॄ →15.. लॄ →16


*व्यंजनमाला*


क→1 ... ख→2 ... ग→3 ... घ→4 ...

ङ→5 ... च→6... छ→7 ... ज→8 ...

झ→9... ञ→10 ... ट→11 ... ठ→12 ...

ड→13 ... ढ→14 ... ण→१15 ... त→16 ...

थ→17... द→18 ... ध→19 ... न→20 ...

प→21 ... फ→22 ... ब→23 ... भ→24 ...

म→25 ... य→26 ... र→27 ... ल→28 ...

व→29 ... श→30 ... ष→31 ... स→32 ...

ह→33 ... क्ष→34 ... त्र→35 ... ज्ञ→36 ...

ड़ 37 ... ढ़ ... 38

--~~~ओ अहं = ब्रह्म ~~~--

ब्रह्म = ब+र+ह+म =23+27+33+25=108


*( 1 )* 


यह मात्रिकाएँ (16स्वर +38 व्यंजन=54 ) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।।


*( 2 )* 


मनुष्य शरीर की ऊँचाई

= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि 

= ( 4 अँगुलियों) का 27 गुणा होती है। 

= 4 × 27 = 108


*( 3 )* 


नक्षत्रों की कुल संख्या = 27

प्रत्येक नक्षत्र के चरण = 4

जप की विशिष्ट संख्या = 108

अर्थात् ॐ मंत्र जप कम से कम 108 बार करना चाहिये ।


*( 4 )* 


एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य

★ पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=108

★ पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=108

अर्थात् मन्त्र जप 108 से कम नहीं करना चाहिये।


*( 5 )* 


हिंसात्मक पापों की संख्या 36 मानी गई है जो मन, वचन व कर्म 3 प्रकार से होते है। अर्थात् 36×3=108। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम 108 अवश्य ही करना चाहिये।


*( 6 )* 


सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है। दिन-रात के 24 घंटों में से 12 घंटे सोने व गृहस्थ कर्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है 10800 बार। इस समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए 10800 की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये 108 की संख्या निर्धारित करते हैं।


*( 7 )* 


एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह

दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थिति

में 108000 बार कलाएं बदलता है।


*( 8 ) 786 का भी हिंदू आध्यात्मिक जवाब — ॥ 108 ॥*


*( 9 )* 


ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 में राशियों की संख्या को 12 से गुणा करें तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।


*( 10 )* 


108 में तीन अंक हैं, 1, 0 , 8. इनमें एक “1" ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर का एक सत्ता है अर्थात ईश्वर १ है और मन भी एक है, शून्य “0" प्रकृति को दर्शाता है। आठ “8" जीवात्मा को दर्शाता है क्योंकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के आठो मूल से विरक्त हो कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “8" को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “0" का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “1" का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “0" में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “0" को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , अर्थात शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “8" ईश्वर “1" से नहीं मिल पायेगा, पूर्णता ( 1+8 =9 ) को नहीं प्राप्त कर पायेगा ।

9 पूर्णता (पूर्णांक )का सूचक है।


*( 11 )* 


1- ईश्वर और मन

2- द्वैत, दुनिया, संसार

3- गुण प्रकृति (माया)

4- अवस्था भेद (वर्ण)

5- इन्द्रियाँ

6- विकार

7- सप्तऋषि, सप्तसोपान

8- आष्टांग योग

9- नवधा भक्ति (पूर्णता)


*( 12 )* 


वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार 


अहंकार के गुण = 2

बुद्धि के गुण = 3

मन के गुण = 4

आकाश के गुण = 5

वायु के गुण = 6

अग्नि के गुण = 7

जल के गुण = 8

पॄथ्वी के गुण = 9

2+3+4+5+6+7+8+9 =

अत: प्रकृति के कुल गुण = 44

जीव के गुण = 10

इस प्रकार संख्या का योग = 54 

अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = 54

एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = 54

दोंनों संख्याओं का योग = 108


*( 13 )*


संख्या “1" एक ईश्वर का संकेत है।

संख्या “0" जड़ प्रकृति का संकेत है।

संख्या “8" बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है।

[ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ]

[ यही पवित्र त्रेतवाद है ]


संख्या “2" से “9" तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “0" रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “0" न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती। “1" की चेतना से “8" का खेल । “8" यानी “2" से “9" । 

यह “8" क्या है ? मन के “8" वर्ग या भाव । 


*ये आठ भाव ये हैं ।*


1. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । 2. क्रोध । 3. लोभ । 4. मोह । 5. मद ( घमण्ड ) । 6. मत्सर ( जलन ) । 7. ज्ञान । 8. वैराग । 


एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है 

——★ ॥ 108 ॥ ★——

इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।


*( 14 )*


सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें ।


इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ वसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियाँ पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।


रहस्यमय संख्या 108 का हिन्दू- वैदिक संस्कृति के साथ हजारों सम्बन्ध हैं जिनमें से कुछ का संग्रह है।

संस्कृत भाषा

 विश्व की सबसे ज्यादा समृद्ध भाषा कौन सी है ? 


अंग्रेजी में 'THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG' एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए हैं। मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया है। जिसमें चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है। 


अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये।-


*क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।*

*तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।* 


अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन ?? राजा मय ! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।


श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाई दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है! 


पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल *एक अक्षर* से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है। किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-


*न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।*

*नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥*


अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्! 


एक और उदहारण है।


*दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः।*

*दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः।।*


अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खंडन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।


है ना खूबसूरत !! इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल *2 अक्षर* से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असंभव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये -


*भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे*

*भेरीरे। भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।*


अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।


एक और उदाहरण -


*क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।*

*कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥*


अर्थात - क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।


पुनः क्या किसी भाषा मे केवल *तीन अक्षर* से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!

उदहारण - 


*देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां।*

*दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।*


अर्थात - वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था।


जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है। जैसे इस विश्व का नाम संसार है तो इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है-

संसरतीति संसारः गच्छतीति जगत् आकर्षयतीति कृष्णः रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः इत्यादि।


विश्व की अन्य भाषाओं में ऐसी अभिधानसार्थकता नहीं है। Good का अर्थ अच्छा, भला, सुंदर, उत्तम, प्रियदर्शन, स्वस्थ आदि है। किसी अंग्रेजी विद्वान् से पूछो कि ऐसा क्यों है तो वह कहेगा है बस पहले से ही इसके ये अर्थ हैं। क्यों हैं वो ये नहीं बता पायेगा। 


ऐसी सरल, तर्कसंगत और समृद्ध भाषा आज अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड रही है बेहद चिंताजनक है।

 संस्कृत का अध्ययन और अध्यापन इस देश की गौरवमयी संस्कृति के ज्ञान के लिए अत्यंत आवश्यक है । जय संस्कृत, जय संस्कृति !

संस्कृत क्यों विशेष है !

अब लौटते हैं वापिस संस्कृत के महत्व पर !

बचपन में अंग्रेज़ी का रुतबा था मेरे मन पर !

खूब सीखा , लिखने में अत्यंत दक्ष हुआ किंतु बोलने में मन नहीं लगा ,

माँ को मम्मी कहने में बड़ी असुविधा लगी !

माता, माते और मय्या से आगे नहीं जा पाया !

फिर उर्दू का ड़ नशा चढ़ा ,ग़ालिब ,मीर ,ज़ौक़ , साहिर,कैफ़ि , मलीहाबादी ,फ़िराक़ , इक़बाल और न जाने कितनी के दीवान पढ़े !

फिर अधिकारी हुआ , प्रबंधन सूत्र में ये सब गोल थे ,

फिर ड्रकर ,कॉट्लर, कोवे, टॉम पीटर , मेसलो,वन मिनट मैनेजर ,Wayne dyer को पढ़ा ,

फिर देखा बंदे गीता ,उपनिषद की बात कर रहे हैं ,

घर में गीता ,रामायण और ये सब पढ़ ही रहा था किंतु सच्चा प्रेम नहीं था !

अब नयी दृष्टि से देखना शुरू किया !फिर पाया कि संस्कृत के साहित्य के आगे सब बौने हैं vah भी तब जब पिछले चार सौ साल में कुछ भी नहीं likha गया hai !

अब एक उदाहरण देखे :भारत सरकार के सभी महत्व पूर्ण विभाग के आदर्श वाक्य देखें 

हमारा LIC का hai योगक्षेमं वहाम्यहम् ,

Oriental insurance ka hai , अग्नये सुपथा राये 

GIC का है आपातकाले रक्षयामि

agriculture insurance कम्पनी का कृषक यत्न रक्षणम है

.विभिन्न संस्थाओं के संस्कृत ध्येय वाक्य :-

.भारत सरकार 👉 सत्यमेव जयते

लोक सभा 👉 धर्मचक्र प्रवर्तनाय

उच्चतम न्यायालय 👉 यतो धर्मस्ततो जयः

आल इंडिया रेडियो 👉 सर्वजन हिताय सर्वजनसुखाय 

‌दूरदर्शन 👉 सत्यं शिवं सुन्दरम्

.

गोवा राज्य 👉 सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।

भारतीय जीवन बीमा निगम 👉 योगक्षेमं वहाम्यहम्

डाक तार विभाग 👉 अहर्निशं सेवामहे

श्रम मंत्रालय 👉 श्रम एव जयते

भारतीय सांख्यिकी संस्थान 👉 भिन्नेष्वेकस्य दर्शनम्

.

थल सेना 👉 सेवा अस्माकं धर्मः

वायु सेना 👉 नभःस्पृशं दीप्तम्

जल सेना 👉 शं नो वरुणः

मुंबई पुलिस 👉 सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय

हिंदी अकादमी 👉 अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्

.

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञानं अकादमी 👉 हव्याभिर्भगः सवितुर्वरेण्यम्

भारतीय प्रशासनिक सेवा अकादमी 👉 योगः कर्मसु कौशलम्

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 👉 ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये

नेशनल कौंसिल फॉर टीचर एजुकेशन 👉 गुरुर्गुरुतमो धाम

गुरुकुल काङ्गडी विश्वविद्यालय 👉 ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत

.

इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय 👉 ज्योतिर्व्रणीत तमसो विज्ञानन

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय 👉 विद्ययाऽमृतमश्नुते

आन्ध्र विश्वविद्यालय 👉 तेजस्विनावधीतमस्तु

बंगाल अभियांत्रिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय शिवपुर 👉 उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत

गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय 👉 आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः

.

संपूणानंद संस्कृत विश्वविद्यालय 👉 श्रुतं मे गोपाय

श्री वैंकटेश्वर विश्वविद्यालय 👉 ज्ञानं सम्यग् वेक्षणम्

कालीकट विश्वविद्यालय 👉 निर्भय कर्मणा श्री

दिल्ली विश्वविद्यालय 👉 निष्ठा धृति: सत्यम्

केरल विश्वविद्यालय 👉 कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा

.

राजस्थान विश्वविद्यालय 👉 धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा

पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय 👉

युक्तिहीने विचारे तु धर्महानि: प्रजायते

वनस्थली विद्यापीठ 👉 सा विद्या या विमुक्तये

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् 👉

विद्याsमृतमश्नुते

.

केन्द्रीय विद्यालय 👉 तत् त्वं पूषन् अपावृणु

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड 👉 असतो मा सद्गमय

प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम 👉 कर्मज्यायो हि अकर्मण:

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर 👉 धियो यो नः प्रचोदयात्

गोविंद बल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पौड़ी 👉 तमसो मा ज्योतिर्गमय

.

मदनमोहन मालवीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय गोरखपुर 👉 योगः कर्मसु कौशलम्

लभारतीय प्रशासनिक कर्मचारी महाविद्यालय, हैदराबाद 👉 संगच्छध्वं संवदध्वम्

इंडिया विश्वविद्यालय का राष्ट्रीय विधि विद्यालय 👉 धर्मो रक्षति रक्षितः

संत स्टीफन महाविद्यालय, दिल्ली 👉 सत्यमेव विजयते नानृतम्

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान 👉 शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनम्

.

विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नागपुर 👉 योग: कर्मसु कौशलम्

मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान,इलाहाबाद 👉 सिद्धिर्भवति कर्मजा

बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी 👉 ज्ञानं परमं बलम्

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर 👉 योगः कर्मसुकौशलम्

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई 👉 ज्ञानं परमं ध्येयम्

.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर 👉 तमसो मा ज्योतिर्गमय

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान चेन्नई 👉 सिद्धिर्भवति कर्मजा

भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद 👉 विद्या विनियोगाद्विकास:

भारतीय प्रबंधन संस्थान बंगलौर 👉 तेजस्वि नावधीतमस्तु

भारतीय प्रबंधन संस्थान कोझीकोड 👉 योगः कर्मसु कौशलम्

.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की 👉 श्रमं विना नकिमपि साध्यम्

सेना ई एम ई कोर 👉 कर्मह हि धर्मह

सेना राजपूताना राजफल 👉 वीर भोग्या वसुन्धरा

सेना मेडिकल कोर 👉 सर्वे संतु निरामया ..

सेना शिक्षा कोर 👉 विद्यैव बलम्

.

सेना एयर डिफेन्स 👉 आकाशेय शत्रुन् जहि

सेना ग्रेनेडियर रेजिमेन्ट 👉 सर्वदा शक्तिशालिम्

सेना राजपूत बटालियन 👉 सर्वत्र विजये

सेना डोगरा रेजिमेन्ट 👉 कर्तव्यम् अन्वात्मा

सेना गढवाल रायफल 👉 युद्धया कृत निश्चयः

.

सेना कुमायू रेजिमेन्ट 👉 पराक्रमो विजयते

सेना महार रेजिमेन्ट 👉 यश सिद्धि

सेना जम्मू काश्मीर रायफल 👉 प्रस्थ रणवीरता

सेना कश्मीर लाइट इंफैन्ट्री 👉 बलिदानं वीर-लक्ष्यम्

सेना इंजीनियर रेजिमेन्ट 👉 सर्वत्र

.

भारतीय तट रक्षक 👉 वयम् रक्षामः

सैन्य विद्यालय 👉 युद्धं प्रगायय?

सैन्य अनुसंधान केंद्र 👉 बलस्य मूलं विज्ञानम्

मित्रों ! ये सिलसिला यहीं खतम नहीं होता...विदेशी भी हमारे कायल हैं देखो जरा...

नेपाल सरकार 👉 जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

.

पञ्चचित पेरादेनिया विश्वविद्यालय 👉 सर्वस्य लोचनशास्त्रम्

कोलंबो विश्वविद्यालय- (श्रीलंका) 👉 बुद्धि: सर्वत्र भ्राजते

इंडोनेशिया - जलसेना 👉 जलेष्वेव जयामहे पञ्चचित

मोराटुवा विश्वविद्यालय (श्रीलंका) 👉 विद्यैव सर्वधनम् पेरादे 

संस्कृत और संस्कृति ही भारतीयता का मूल है .. भारत ही नहीं विश्व ही का विकास इसी से संभव है ! 

विश्व को परिवार सिर्फ़ यही भाषा कहती है वरना शेष भाषाएँ प्रांत विशेष को ही अपना कहती हैं !

सारा विश्व विरोधी है किंतु चोरी करणे को यहीं के रत्न भाते हैं 

अमेरिका ने अणु बम गिराया तो गीता को दोहराया !

तो कीजिये अपने गौरव को याद और सिर उठाकर कहिये "हम भारतीय हैं और संस्कृत हमारी पहचान है, हमें अपने गौरव का अभिमान है।

जयतु_संस्कृतम्_जयतु_भारतम्_ जयतु जगत 


🌹🙏

गायत्री मंत्र रहस्य

 ॥ सर्व गायत्री मंत्र॥

145 देवो के गायत्री मंत्र

1 सूर्य ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

 2 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् ॥

 3 ॐ प्रभाकराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

4 ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

5 ॐ भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि तन्न आदित्यः प्रचोदयात् ॥ 

6 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

7 ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

8 ॐ भास्कराय विद्महे महाद्द्युतिकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

9 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 

10 ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 

11 ॐ निशाकराय विद्महे #कलानाथाय धीमहि तन्नः सोमः प्रचोदयात् ॥ 

12 अङ्गारक, भौम, मङ्गल, कुज ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥ 

13 ॐ अङ्गारकाय विद्महे भूमिपालाय धीमहि तन्नः कुजः प्रचोदयात् ॥

 14 ॐ चित्रिपुत्राय विद्महे लोहिताङ्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

15 ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

 16 बुध ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥

 17 ॐ #चन्द्रपुत्राय विद्महे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः 

प्रचोदयात् ॥

18 ॐ सौम्यरूपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥ 

19 गुरु ॐ वृषभध्वजाय विद्महे क्रुनिहस्ताय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

 20 ॐ सुराचार्याय विद्महे सुरश्रेष्ठाय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

 21 शुक्र ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

22 ॐ रजदाभाय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥ 

23 ॐ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

 24 शनीश्वर, शनैश्चर, शनी ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥ 

25 ॐ शनैश्चराय विद्महे सूर्यपुत्राय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥

 26 ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात् ॥

27 राहु ॐ नाकध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥

28 ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥

29 केतु ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥

30 ॐ चित्रवर्णाय विद्महे सर्परूपाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥