Wednesday, March 20, 2024

संख्या 108 का रहस्य

 ॥ 108 ॥ का_रहस्य


॥ॐ॥ का जप करते समय 108 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है । 


॥ 108 ॥

यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय ( काल ) से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है।  


*★ आइये जाने संख्या 108 का रहस्य ★*


*स्वरमाला*


अ→1 ... आ→2... इ→3 ... ई→4 ... उ→5... ऊ→6 ... ए→7 ... ऐ→8 ओ→9 ... औ→10 ... ऋ→11 ... लृ→12

अं→13 ... अ:→14.. 

ऋॄ →15.. लॄ →16


*व्यंजनमाला*


क→1 ... ख→2 ... ग→3 ... घ→4 ...

ङ→5 ... च→6... छ→7 ... ज→8 ...

झ→9... ञ→10 ... ट→11 ... ठ→12 ...

ड→13 ... ढ→14 ... ण→१15 ... त→16 ...

थ→17... द→18 ... ध→19 ... न→20 ...

प→21 ... फ→22 ... ब→23 ... भ→24 ...

म→25 ... य→26 ... र→27 ... ल→28 ...

व→29 ... श→30 ... ष→31 ... स→32 ...

ह→33 ... क्ष→34 ... त्र→35 ... ज्ञ→36 ...

ड़ 37 ... ढ़ ... 38

--~~~ओ अहं = ब्रह्म ~~~--

ब्रह्म = ब+र+ह+म =23+27+33+25=108


*( 1 )* 


यह मात्रिकाएँ (16स्वर +38 व्यंजन=54 ) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।।


*( 2 )* 


मनुष्य शरीर की ऊँचाई

= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि 

= ( 4 अँगुलियों) का 27 गुणा होती है। 

= 4 × 27 = 108


*( 3 )* 


नक्षत्रों की कुल संख्या = 27

प्रत्येक नक्षत्र के चरण = 4

जप की विशिष्ट संख्या = 108

अर्थात् ॐ मंत्र जप कम से कम 108 बार करना चाहिये ।


*( 4 )* 


एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य

★ पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास=108

★ पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास=108

अर्थात् मन्त्र जप 108 से कम नहीं करना चाहिये।


*( 5 )* 


हिंसात्मक पापों की संख्या 36 मानी गई है जो मन, वचन व कर्म 3 प्रकार से होते है। अर्थात् 36×3=108। अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम 108 अवश्य ही करना चाहिये।


*( 6 )* 


सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है। दिन-रात के 24 घंटों में से 12 घंटे सोने व गृहस्थ कर्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है 10800 बार। इस समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए 10800 की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये 108 की संख्या निर्धारित करते हैं।


*( 7 )* 


एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह

दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थिति

में 108000 बार कलाएं बदलता है।


*( 8 ) 786 का भी हिंदू आध्यात्मिक जवाब — ॥ 108 ॥*


*( 9 )* 


ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 में राशियों की संख्या को 12 से गुणा करें तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।


*( 10 )* 


108 में तीन अंक हैं, 1, 0 , 8. इनमें एक “1" ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर का एक सत्ता है अर्थात ईश्वर १ है और मन भी एक है, शून्य “0" प्रकृति को दर्शाता है। आठ “8" जीवात्मा को दर्शाता है क्योंकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के आठो मूल से विरक्त हो कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “8" को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “0" का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “1" का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “0" में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “0" को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , अर्थात शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “8" ईश्वर “1" से नहीं मिल पायेगा, पूर्णता ( 1+8 =9 ) को नहीं प्राप्त कर पायेगा ।

9 पूर्णता (पूर्णांक )का सूचक है।


*( 11 )* 


1- ईश्वर और मन

2- द्वैत, दुनिया, संसार

3- गुण प्रकृति (माया)

4- अवस्था भेद (वर्ण)

5- इन्द्रियाँ

6- विकार

7- सप्तऋषि, सप्तसोपान

8- आष्टांग योग

9- नवधा भक्ति (पूर्णता)


*( 12 )* 


वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार 


अहंकार के गुण = 2

बुद्धि के गुण = 3

मन के गुण = 4

आकाश के गुण = 5

वायु के गुण = 6

अग्नि के गुण = 7

जल के गुण = 8

पॄथ्वी के गुण = 9

2+3+4+5+6+7+8+9 =

अत: प्रकृति के कुल गुण = 44

जीव के गुण = 10

इस प्रकार संख्या का योग = 54 

अत: सृष्टि उत्पत्ति की संख्या = 54

एवं सृष्टि प्रलय की संख्या = 54

दोंनों संख्याओं का योग = 108


*( 13 )*


संख्या “1" एक ईश्वर का संकेत है।

संख्या “0" जड़ प्रकृति का संकेत है।

संख्या “8" बहुआयामी जीवात्मा का संकेत है।

[ यह तीन अनादि परम वैदिक सत्य हैं ]

[ यही पवित्र त्रेतवाद है ]


संख्या “2" से “9" तक एक बात सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में “0" रूपी स्थान पर जीवन है। इसलिये यदि “0" न हो तो कोई क्रम गणना आदि नहीं हो सकती। “1" की चेतना से “8" का खेल । “8" यानी “2" से “9" । 

यह “8" क्या है ? मन के “8" वर्ग या भाव । 


*ये आठ भाव ये हैं ।*


1. काम ( विभिन्न इच्छायें / वासनायें ) । 2. क्रोध । 3. लोभ । 4. मोह । 5. मद ( घमण्ड ) । 6. मत्सर ( जलन ) । 7. ज्ञान । 8. वैराग । 


एक सामान्य आत्मा से महानात्मा तक की यात्रा का प्रतीक है 

——★ ॥ 108 ॥ ★——

इन आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है ।


*( 14 )*


सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से नौ रश्मियां निकलती हैं और ये चारो ओर से अलग-अलग निकलती है। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गई। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बनें ।


इस तरह सूर्य की जब नौ रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनका पृथ्वी के आठ वसुओं से टक्कर होती हैं। सूर्य की नौ रश्मियां और पृथ्वी के आठ वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुई वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गई। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियाँ पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।


रहस्यमय संख्या 108 का हिन्दू- वैदिक संस्कृति के साथ हजारों सम्बन्ध हैं जिनमें से कुछ का संग्रह है।

संस्कृत भाषा

 विश्व की सबसे ज्यादा समृद्ध भाषा कौन सी है ? 


अंग्रेजी में 'THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG' एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए हैं। मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया है। जिसमें चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है। 


अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये।-


*क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।*

*तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।* 


अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन ?? राजा मय ! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।


श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाई दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है! 


पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल *एक अक्षर* से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है। किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-


*न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।*

*नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥*


अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्! 


एक और उदहारण है।


*दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः।*

*दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः।।*


अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खंडन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।


है ना खूबसूरत !! इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल *2 अक्षर* से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असंभव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये -


*भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे*

*भेरीरे। भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।*


अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।


एक और उदाहरण -


*क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।*

*कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥*


अर्थात - क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।


पुनः क्या किसी भाषा मे केवल *तीन अक्षर* से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है ?? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!

उदहारण - 


*देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां।*

*दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।*


अर्थात - वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था।


जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है। जैसे इस विश्व का नाम संसार है तो इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है-

संसरतीति संसारः गच्छतीति जगत् आकर्षयतीति कृष्णः रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः इत्यादि।


विश्व की अन्य भाषाओं में ऐसी अभिधानसार्थकता नहीं है। Good का अर्थ अच्छा, भला, सुंदर, उत्तम, प्रियदर्शन, स्वस्थ आदि है। किसी अंग्रेजी विद्वान् से पूछो कि ऐसा क्यों है तो वह कहेगा है बस पहले से ही इसके ये अर्थ हैं। क्यों हैं वो ये नहीं बता पायेगा। 


ऐसी सरल, तर्कसंगत और समृद्ध भाषा आज अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड रही है बेहद चिंताजनक है।

 संस्कृत का अध्ययन और अध्यापन इस देश की गौरवमयी संस्कृति के ज्ञान के लिए अत्यंत आवश्यक है । जय संस्कृत, जय संस्कृति !

संस्कृत क्यों विशेष है !

अब लौटते हैं वापिस संस्कृत के महत्व पर !

बचपन में अंग्रेज़ी का रुतबा था मेरे मन पर !

खूब सीखा , लिखने में अत्यंत दक्ष हुआ किंतु बोलने में मन नहीं लगा ,

माँ को मम्मी कहने में बड़ी असुविधा लगी !

माता, माते और मय्या से आगे नहीं जा पाया !

फिर उर्दू का ड़ नशा चढ़ा ,ग़ालिब ,मीर ,ज़ौक़ , साहिर,कैफ़ि , मलीहाबादी ,फ़िराक़ , इक़बाल और न जाने कितनी के दीवान पढ़े !

फिर अधिकारी हुआ , प्रबंधन सूत्र में ये सब गोल थे ,

फिर ड्रकर ,कॉट्लर, कोवे, टॉम पीटर , मेसलो,वन मिनट मैनेजर ,Wayne dyer को पढ़ा ,

फिर देखा बंदे गीता ,उपनिषद की बात कर रहे हैं ,

घर में गीता ,रामायण और ये सब पढ़ ही रहा था किंतु सच्चा प्रेम नहीं था !

अब नयी दृष्टि से देखना शुरू किया !फिर पाया कि संस्कृत के साहित्य के आगे सब बौने हैं vah भी तब जब पिछले चार सौ साल में कुछ भी नहीं likha गया hai !

अब एक उदाहरण देखे :भारत सरकार के सभी महत्व पूर्ण विभाग के आदर्श वाक्य देखें 

हमारा LIC का hai योगक्षेमं वहाम्यहम् ,

Oriental insurance ka hai , अग्नये सुपथा राये 

GIC का है आपातकाले रक्षयामि

agriculture insurance कम्पनी का कृषक यत्न रक्षणम है

.विभिन्न संस्थाओं के संस्कृत ध्येय वाक्य :-

.भारत सरकार 👉 सत्यमेव जयते

लोक सभा 👉 धर्मचक्र प्रवर्तनाय

उच्चतम न्यायालय 👉 यतो धर्मस्ततो जयः

आल इंडिया रेडियो 👉 सर्वजन हिताय सर्वजनसुखाय 

‌दूरदर्शन 👉 सत्यं शिवं सुन्दरम्

.

गोवा राज्य 👉 सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।

भारतीय जीवन बीमा निगम 👉 योगक्षेमं वहाम्यहम्

डाक तार विभाग 👉 अहर्निशं सेवामहे

श्रम मंत्रालय 👉 श्रम एव जयते

भारतीय सांख्यिकी संस्थान 👉 भिन्नेष्वेकस्य दर्शनम्

.

थल सेना 👉 सेवा अस्माकं धर्मः

वायु सेना 👉 नभःस्पृशं दीप्तम्

जल सेना 👉 शं नो वरुणः

मुंबई पुलिस 👉 सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय

हिंदी अकादमी 👉 अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्

.

भारतीय राष्ट्रीय विज्ञानं अकादमी 👉 हव्याभिर्भगः सवितुर्वरेण्यम्

भारतीय प्रशासनिक सेवा अकादमी 👉 योगः कर्मसु कौशलम्

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 👉 ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये

नेशनल कौंसिल फॉर टीचर एजुकेशन 👉 गुरुर्गुरुतमो धाम

गुरुकुल काङ्गडी विश्वविद्यालय 👉 ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत

.

इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय 👉 ज्योतिर्व्रणीत तमसो विज्ञानन

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय 👉 विद्ययाऽमृतमश्नुते

आन्ध्र विश्वविद्यालय 👉 तेजस्विनावधीतमस्तु

बंगाल अभियांत्रिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय शिवपुर 👉 उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत

गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय 👉 आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः

.

संपूणानंद संस्कृत विश्वविद्यालय 👉 श्रुतं मे गोपाय

श्री वैंकटेश्वर विश्वविद्यालय 👉 ज्ञानं सम्यग् वेक्षणम्

कालीकट विश्वविद्यालय 👉 निर्भय कर्मणा श्री

दिल्ली विश्वविद्यालय 👉 निष्ठा धृति: सत्यम्

केरल विश्वविद्यालय 👉 कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा

.

राजस्थान विश्वविद्यालय 👉 धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा

पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय 👉

युक्तिहीने विचारे तु धर्महानि: प्रजायते

वनस्थली विद्यापीठ 👉 सा विद्या या विमुक्तये

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् 👉

विद्याsमृतमश्नुते

.

केन्द्रीय विद्यालय 👉 तत् त्वं पूषन् अपावृणु

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड 👉 असतो मा सद्गमय

प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम 👉 कर्मज्यायो हि अकर्मण:

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर 👉 धियो यो नः प्रचोदयात्

गोविंद बल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पौड़ी 👉 तमसो मा ज्योतिर्गमय

.

मदनमोहन मालवीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय गोरखपुर 👉 योगः कर्मसु कौशलम्

लभारतीय प्रशासनिक कर्मचारी महाविद्यालय, हैदराबाद 👉 संगच्छध्वं संवदध्वम्

इंडिया विश्वविद्यालय का राष्ट्रीय विधि विद्यालय 👉 धर्मो रक्षति रक्षितः

संत स्टीफन महाविद्यालय, दिल्ली 👉 सत्यमेव विजयते नानृतम्

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान 👉 शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनम्

.

विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नागपुर 👉 योग: कर्मसु कौशलम्

मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान,इलाहाबाद 👉 सिद्धिर्भवति कर्मजा

बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी 👉 ज्ञानं परमं बलम्

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर 👉 योगः कर्मसुकौशलम्

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई 👉 ज्ञानं परमं ध्येयम्

.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर 👉 तमसो मा ज्योतिर्गमय

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान चेन्नई 👉 सिद्धिर्भवति कर्मजा

भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद 👉 विद्या विनियोगाद्विकास:

भारतीय प्रबंधन संस्थान बंगलौर 👉 तेजस्वि नावधीतमस्तु

भारतीय प्रबंधन संस्थान कोझीकोड 👉 योगः कर्मसु कौशलम्

.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की 👉 श्रमं विना नकिमपि साध्यम्

सेना ई एम ई कोर 👉 कर्मह हि धर्मह

सेना राजपूताना राजफल 👉 वीर भोग्या वसुन्धरा

सेना मेडिकल कोर 👉 सर्वे संतु निरामया ..

सेना शिक्षा कोर 👉 विद्यैव बलम्

.

सेना एयर डिफेन्स 👉 आकाशेय शत्रुन् जहि

सेना ग्रेनेडियर रेजिमेन्ट 👉 सर्वदा शक्तिशालिम्

सेना राजपूत बटालियन 👉 सर्वत्र विजये

सेना डोगरा रेजिमेन्ट 👉 कर्तव्यम् अन्वात्मा

सेना गढवाल रायफल 👉 युद्धया कृत निश्चयः

.

सेना कुमायू रेजिमेन्ट 👉 पराक्रमो विजयते

सेना महार रेजिमेन्ट 👉 यश सिद्धि

सेना जम्मू काश्मीर रायफल 👉 प्रस्थ रणवीरता

सेना कश्मीर लाइट इंफैन्ट्री 👉 बलिदानं वीर-लक्ष्यम्

सेना इंजीनियर रेजिमेन्ट 👉 सर्वत्र

.

भारतीय तट रक्षक 👉 वयम् रक्षामः

सैन्य विद्यालय 👉 युद्धं प्रगायय?

सैन्य अनुसंधान केंद्र 👉 बलस्य मूलं विज्ञानम्

मित्रों ! ये सिलसिला यहीं खतम नहीं होता...विदेशी भी हमारे कायल हैं देखो जरा...

नेपाल सरकार 👉 जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

.

पञ्चचित पेरादेनिया विश्वविद्यालय 👉 सर्वस्य लोचनशास्त्रम्

कोलंबो विश्वविद्यालय- (श्रीलंका) 👉 बुद्धि: सर्वत्र भ्राजते

इंडोनेशिया - जलसेना 👉 जलेष्वेव जयामहे पञ्चचित

मोराटुवा विश्वविद्यालय (श्रीलंका) 👉 विद्यैव सर्वधनम् पेरादे 

संस्कृत और संस्कृति ही भारतीयता का मूल है .. भारत ही नहीं विश्व ही का विकास इसी से संभव है ! 

विश्व को परिवार सिर्फ़ यही भाषा कहती है वरना शेष भाषाएँ प्रांत विशेष को ही अपना कहती हैं !

सारा विश्व विरोधी है किंतु चोरी करणे को यहीं के रत्न भाते हैं 

अमेरिका ने अणु बम गिराया तो गीता को दोहराया !

तो कीजिये अपने गौरव को याद और सिर उठाकर कहिये "हम भारतीय हैं और संस्कृत हमारी पहचान है, हमें अपने गौरव का अभिमान है।

जयतु_संस्कृतम्_जयतु_भारतम्_ जयतु जगत 


🌹🙏

गायत्री मंत्र रहस्य

 ॥ सर्व गायत्री मंत्र॥

145 देवो के गायत्री मंत्र

1 सूर्य ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

 2 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् ॥

 3 ॐ प्रभाकराय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

4 ॐ अश्वध्वजाय विद्महे पाशहस्ताय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

5 ॐ भास्कराय विद्महे महद्द्युतिकराय धीमहि तन्न आदित्यः प्रचोदयात् ॥ 

6 ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

7 ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

8 ॐ भास्कराय विद्महे महाद्द्युतिकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥ 

9 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 

10 ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥ 

11 ॐ निशाकराय विद्महे #कलानाथाय धीमहि तन्नः सोमः प्रचोदयात् ॥ 

12 अङ्गारक, भौम, मङ्गल, कुज ॐ वीरध्वजाय विद्महे विघ्नहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥ 

13 ॐ अङ्गारकाय विद्महे भूमिपालाय धीमहि तन्नः कुजः प्रचोदयात् ॥

 14 ॐ चित्रिपुत्राय विद्महे लोहिताङ्गाय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

15 ॐ अङ्गारकाय विद्महे शक्तिहस्ताय धीमहि तन्नो भौमः प्रचोदयात् ॥

 16 बुध ॐ गजध्वजाय विद्महे सुखहस्ताय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥

 17 ॐ #चन्द्रपुत्राय विद्महे रोहिणी प्रियाय धीमहि तन्नो बुधः 

प्रचोदयात् ॥

18 ॐ सौम्यरूपाय विद्महे वाणेशाय धीमहि तन्नो बुधः प्रचोदयात् ॥ 

19 गुरु ॐ वृषभध्वजाय विद्महे क्रुनिहस्ताय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

 20 ॐ सुराचार्याय विद्महे सुरश्रेष्ठाय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥

 21 शुक्र ॐ अश्वध्वजाय विद्महे धनुर्हस्ताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

22 ॐ रजदाभाय विद्महे भृगुसुताय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥ 

23 ॐ भृगुसुताय विद्महे दिव्यदेहाय धीमहि तन्नः शुक्रः प्रचोदयात् ॥

 24 शनीश्वर, शनैश्चर, शनी ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥ 

25 ॐ शनैश्चराय विद्महे सूर्यपुत्राय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥

 26 ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात् ॥

27 राहु ॐ नाकध्वजाय विद्महे पद्महस्ताय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥

28 ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ॥

29 केतु ॐ अश्वध्वजाय विद्महे शूलहस्ताय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥

30 ॐ चित्रवर्णाय विद्महे सर्परूपाय धीमहि तन्नः केतुः प्रचोदयात् ॥

Monday, May 31, 2021

अध्याय दशम

 *(श्री गीताजी दसवां अध्याय )*


*गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए।*


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशंमेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।


*श्रीगीताजी* ( दसवां अध्याय) 


*अथ दशमोऽध्यायः* ( श्रीगीताजी दसवां अध्याय ) 


*श्रीभगवानुवाच* 


*भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥*


श्री भगवान् बोले - हे महाबाहो ! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन , जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवाले के लिये हित की इच्छासे कहूँगा ॥१॥ 


*न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥*


मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते  हैं , क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियोंका भी आदिकारण हूँ ॥२॥ 


*यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥* 


जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित , अनादि और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है , वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ॥३ ॥ 


*बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च । अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥*


निश्चय करने की शक्ति , यथार्थ ज्ञान , असम्मूढ़ता , क्षमा , सत्य , इन्द्रियों का वशमें करना , मनका निग्रह तथा सुख - दुःख , उत्पत्ति - प्रलय और भय - अभय तथा अहिंसा , समता , सन्तोष , तप , दान , कीर्ति और अपकीर्ति - ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं ॥ ४-५ ॥


*जो पुरुष महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥*


सात महर्षिजन , चार उनसे भी पूर्व में होनेवाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु - ये मुझमें भाव वाले सब - के - सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं , जिनकी संसार में यह सम्पूर्ण प्रजा है ॥६ ॥ 


*एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥* 


मेरी इस परमैश्वर्य रूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है — इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ ७ ॥ 


*अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥* 


मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत की उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है , इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्तिसे युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वरको ही निरन्तर भजते हैं ॥८॥


*मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥*


निरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करनेवाले  भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरन्तर रमण करते हैं ॥९ ॥


*तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥*


उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ , जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥१० ॥ 


*तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥*


हे अर्जुन ! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्तःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप

दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ ॥११॥ 


*अर्जुन उवाच* 


*परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षि रदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥* 


अर्जुन बोले - आप परम ब्रह्म , परम धाम और परम पवित्र हैं , क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन , दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव , अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं । वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं॥१२-१३ ॥ 


*सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥* 


हे केशव ! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं , इस सबको मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन् ! आपके लीलामय स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही ॥१४ ॥


*स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥*


हे भूतों को उत्पन्न करनेवाले ! हे भूतोंके ईश्वर ! हे देवोंके देव ! हे जगत्के स्वामी ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपनेसे अपनेको जानते हैं ॥१५ ॥ 


*वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥*


इसलिये आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियोंको सम्पूर्णतासे कहनेमें समर्थ हैं , जिन विभूतियोंके द्वारा आप इन सब लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं ॥१६ ॥ 


*कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ।*


हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन् ! आप किन - किन भावोंमें मेरेद्वारा चिन्तन करनेयोग्य हैं ? ॥ १७ ॥ 


*विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥*


हे जनार्दन ! अपनी योगशक्तिको और विभूतिको फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये , क्योंकि आपके अमृतमय वचनोंको सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुननेकी उत्कण्ठा बनी ही रहती है ॥१८ ॥ 


*श्रीभगवानुवाच*


*हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥* 


श्री भगवान् बोले - हे कुरुश्रेष्ठ ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं , उनको तेरे लिये प्रधानतासे कहूँगा ; क्योंकि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है ॥१ ९ ॥ 


*अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।* 


हे अर्जुन ! मैं सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतोंका आदि , मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ ॥२० ॥ 


*आदित्यानामहं विष्णुर्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥*


मैं अदितिके बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियोंमें किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ ॥२१ ॥ 


*वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥*


मैं वेदोंमें सामवेद हूँ , देवों में इन्द्र हूँ , इन्द्रियोंमें मन हूँ और भूतप्राणियोंकी चेतना अर्थात् जीवनशक्ति हूँ ॥ २२ ॥


*रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥* 


मैं एकादश रुद्रोंमें शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसोंमें धनका स्वामी कुबेर हूँ । मैं आठ वसुओंमें अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु पर्वत हूँ ॥ २३ ॥ 


*पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥*


पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान । हे पार्थ ! मैं सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें समुद्र हूँ ॥२४ ॥ 


*महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥*


मैं महर्षियोंमें भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ । सब प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय पहाड़ हूँ ॥ २५ ॥ 


*अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ।* 


मैं सब वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष , देवर्षियोंमें नारद मुनि , गन्धर्वो में चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ ॥२६ ॥ 


*उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥* 


घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा , श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्योंमें राजा मुझको जान ॥२७॥ 


*आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥* 


मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ । शास्त्रोक्त रीतिसे सन्तान की उत्पत्तिका हेतु कामदेव हूँ और सर्पोमें सर्पराज वासुकि हूँ ॥२८ ॥ 


*अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥*


 मैं नागों में शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ ॥२९॥


*प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥*


 मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियोंमें मैं गरुड़ हूँ ॥ ३० ॥


*पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥*


मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्रीभागीरथी गंगाजी हूँ ॥३१ ॥ 


*सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥*


हे अर्जुन ! सृष्टियोंका आदि और अन्त तथा मध्य भी मैं ही हूँ । मैं विद्याओंमें अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करनेवालोंका तत्त्व - निर्णयके लिये किया जानेवाला वाद हूँ ॥ ३२ ॥


*अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥*


मैं अक्षरोंमें अकार हूँ और समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ । अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला , विराट्स्वरूप , सबका धारण - पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ ॥ ३३ ॥ 


*मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥*


मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियोंमें कीर्ति ' , श्री , वाक् , स्मृति , मेधा , धृति और क्षमा हूँ ॥ ३४ ॥ 


*बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥*


तथा गायन करनेयोग्य श्रुतियोंमें मैं बृहत्साम और छन्दोंमें गायत्री छन्द हूँ तथा महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ ॥ ३५ ॥


*द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥*


मैं छल करनेवालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ । मैं जीतने वालों का विजय हूँ , निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषोंका सात्त्विक भाव हूँ ॥३६॥ 


वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ 


वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा , पाण्डवोंमें धनञ्जय अर्थात् तू , मुनियोंमें वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ ॥ ३७ ॥


दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥


मैं दमन करनेवालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ , जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ , गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ ॥३८॥ 


*यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥*


और हे अर्जुन ! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है , वह भी मैं ही हूँ ; क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है , जो मुझसे रहित हो ॥३९॥ 


*नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥*


हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है , मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे कहा है ॥४०॥ 


*यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥* 


जो - जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त ,कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है , उस - उसको तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान ॥ ४१ ॥ 


*अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥*

अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है । मैं इस सम्पूर्ण जगत्को अपनी योगशक्ति के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ ॥ ४२ ॥ 


*ॐतत्सदितिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥*

अध्याय नवम

 *अथ नवमोऽध्यायः* ( गीताजी नवम अध्याय )  


*अथध्यानम्* ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुंभवभयहरंसर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेद के गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदों के सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यान में स्थित तद्गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥* 


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकी के आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।

_________________________

*श्रीभगवानुवाच* 

*इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥* 


श्री भगवान् बोले - तुझ दोषदृष्टि रहित भक्त के लिये इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा,जिसको जानकर तू दुःख रूप संसार से मुक्त हो जायगा ॥१॥ 


*राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥*


यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा , सब गोपनीयों का राजा , अतिपवित्र , अतिउत्तम , प्रत्यक्ष फलवाला , धर्मयुक्त , साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है ॥२॥ 


*अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥*


हे परंतप ! इस उपर्युक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसारचक्र में भ्रमण करते रहते हैं ॥३॥


*मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥*


मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बरफ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्पके आधार स्थित हैं , किन्तु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ ॥४॥ 


*न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥*


वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं ; किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण - पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है ॥५॥ 


*यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥* 


जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है , वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं , ऐसा जान ॥६॥ 


*सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥*


हे अर्जुन ! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ ॥७॥


*प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥*


अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को बार - बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ ॥८ ॥ 


*न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥* 


हे अर्जुन ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते ॥९॥ 


*मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥*


हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति चराचरसहित सर्व जगत्को रचती है और इस हेतुसे ही यह संसारचक्र घूम रहा है ॥ १० ॥ 


*अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥*


मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़लोग मनुष्य का

शरीर धारण करने वाले मुझ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योगमाया से संसारके उद्धार के लिये मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वरको साधारण मनुष्य मानते हैं ॥ ११ ॥ 


*मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥*


वे व्यर्थ आशा , व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी , आसुरी और मोहिनी प्रकृतिको ही धारण किये रहते हैं ॥१२॥ 


*महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः।भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥* 


परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! दैवी प्रकृतिके आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतोंका सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरन्तर भजते हैं ॥१३॥


*सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥*


वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हुए और मुझको बार - बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं ॥१४॥ 


*ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥* 


दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण - निराकार ब्रह्मका ज्ञानयज्ञ के द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकारसे स्थित मुझ विराट्स्वरूप परमेश्वरकी पृथक् भावसे उपासना करते हैं ॥१५॥ 


*अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥* 


क्रतु मैं हूँ , यज्ञ मैं हूँ , स्वधा मैं हूँ , ओषधि मैं हूँ , मन्त्र मैं हूँ , घृत मैं हूँ , अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ ॥१६ ॥


पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । 

वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च । 


इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात् धारण करने वाला एवं कर्मो के फलको देनेवाला , पिता , माता , पितामह , जानने योग्य ,पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद , सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ ॥१७॥ 


*गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभव : प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥*


प्राप्त होने योग्य परम धाम , भरण - पोषण करनेवाला , सबका स्वामी , शुभाशुभ का देखने वाला , सबका वासस्थान , शरण लेने योग्य , प्रत्युपकार न चाहकर हित करनेवाला , सबकी उत्पत्ति - प्रलय का हेतु , स्थिति का आधार , निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ ॥१८ ॥ 


*तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥*


मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ , वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ । हे अर्जुन ! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत् - असत् भी मैं ही हूँ ॥१८ ॥


*विद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मनन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥*


तीनों वेदोंमें विधान किये हुए सकाम कर्मों को करने वाले , सोमरस को पीनेवाले , पापरहित पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं ; वे पुरुष अपने पुण्योंके फलरूप स्वर्गलोकको प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगोंको भोगते हैं ॥ २० ॥ 


*ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥*


वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं । इस प्रकार स्वर्ग के साध नरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्मका आश्रय लेनेवाले और भोगों की कामनावाले पुरुष बार - बार आवागमनको प्राप्त होते हैं , अर्थात् पुण्यके प्रभाव से स्वर्गमें जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आते हैं ॥ २१ ॥ यहाँ स्वर्गप्राप्ति के प्रतिबन्धक देवऋणरूप पापसे पवित्र होना समझना चाहिये । 


*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥*


जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं , उन नित्य - निरन्तर मेरा चिन्तन करनेवाले पुरुषोंका योगक्षेम  मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ ॥ २२ ॥ 


*येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥* 


हे अर्जुन ! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं , वे भी मुझको ही पूजते हैं ; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है ॥ २३ ॥ 


*अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥*


क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ ; परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्वसे नहीं जानते , इसीसे गिरते हैं अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥


*यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥* 


देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं , पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं , भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं । इसलिये मेरे भक्तोंका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ २५ ।। 


*पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥* 


जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र , पुष्प , फल , जल आदि अर्पण करता है , उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र - पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ ॥२६॥ 


*यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥* 


हे अर्जुन ! तू जो कर्म करता है , जो खाता है , जो हवन करता है , जो दान देता है और जो तप करता है , वह सब मेरे अर्पण कर ॥२७ ॥ 


*शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥*


इस प्रकार , जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते हैं - ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धन से मुक्त हो जायगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा ॥ २८ ॥ 


*समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥* 


सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ , न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है ; परन्तु जो भक्त मुझको प्रेमसे भजते हैं , वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ ।२९। 


*अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥*


यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है ; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है । अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि 

- परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है ॥ ३० ॥ 


*क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥* 


वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्तिको प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता ॥३१॥ 


*मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥* 


हे अर्जुन ! स्त्री , वैश्य , शूद्र तथा पापयोनि चाण्डाला दि जो कोई भी हों , वे भी मेरे शरण होकर परमगतिको ही प्राप्त होते हैं ॥३२॥


*किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥*


फिर इसमें तो कहना ही क्या है , जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होते हैं । इसलिये तू सुखरहित और क्षणभङ्गुर इस मनुष्य शरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर ॥ ३३ ॥ 


*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥*


मुझ में मन वाला हो , मेरा भक्त बन , मेरा पूजन करनेवाला हो , मुझको प्रणाम कर इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा ॥ ३४ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥*

Sunday, May 30, 2021

अध्याय अष्टम

 *श्रीगीताजी आठवां अध्याय* 


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं 

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । 

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ 


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।


*अथाष्टमोऽध्यायः* 


अर्जुन उवाच


*किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥* 


अर्जुनने कहा - हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत नामसे क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं ॥१ ॥ 


*अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥* 


हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है ? और वह इस शरीर में कैसे है ? तथा युक्तचित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाननेमें आते हैं ॥२ ॥ 


श्रीभगवानुवाच 


*अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः॥* 


श्रीभगवान्ने कहा - परम अक्षर ' ब्रह्म ' है , अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा ' अध्यात्म ' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है , वह ' कर्म ' नाम से कहा गया है ॥ ३ ॥ 


*अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥* 


उत्पत्ति - विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं , हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीरमें मैं वासुदेव ही अन्तर्यामीरूपसे अधियज्ञ हूँ ॥४ ॥ 


*अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥* 


जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है , वह मेरे साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है - इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५॥ 


*यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥* 


हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस 


जिस भी भावको स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता है , उस - उसको ही प्राप्त होता है ; क्योंकि वह सदा उसी भावसे भावित रहा है ॥६ ॥ 


*तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥*


इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन - बुद्धिसे युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा ॥ ७ ॥


*अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥* 


हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योग से युक्त , दूसरी ओर न जाने वाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुषको अर्थात् परमेश्वरको ही प्राप्त होता है ।॥ ८ ॥


*कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥* 


जो पुरुष सर्वज्ञ , अनादि , सबके नियन्ता , सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म , सबके धारण - पोषण करनेवाले अचिन्त्यस्वरूप , सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे , शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है॥९॥ 


*प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥*


वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके , फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है ॥१० ॥


*यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥*


वेदके जाननेवाले विद्वान् जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं , आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं , उस परमपदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा ॥११ ॥ 


*सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥*


सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके , फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राणको मस्तक में स्थापित करके , परमात्म सम्बन्धी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ' ॐ ' इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है , वह पुरुष परमगतिको प्राप्त होता है ॥

 १२-१३ ॥ 


*अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥*


हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है , उस नित्य - निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ , अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ॥ १४ ॥ 


*मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ॥*


परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते ॥ १५ ॥ 


*आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥*


हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्ती हैं , परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं ॥१६ ॥ 


*सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥*


ब्रह्माका जो एक दिन है , उसको एक हजार चतुर्युगीतक की अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं , वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैं ॥१७ ॥


*अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्जके ॥*


सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्मशरीर में ही लीन हो जाते हैं ॥ १८ ॥ 


*भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥*


हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो होकर प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता है ॥१ ९ ॥ 


*परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥*


उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्तभाव है , वह परम दिव्य पुरुष सब भूतोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता ॥ २० ॥


*अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥*


जो अव्यक्त ' अक्षर ' इस नामसे कहा गया है , उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते , वह मेरा परम धाम है ॥ २१ ॥ 


*पुरुषः स पर : पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥*


हे पार्थ ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत् परिपूर्ण है , वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है ॥ २२ ॥ 


*यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।*


हे अर्जुन ! जिस कालमें शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन तो वापस न लौटनेवाली गतिको और जिस कालमें गये हुए वापस लौटनेवाली गतिको ही प्राप्त होते हैं , उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको कहूँगा ॥ २३ ॥ 


*अग्निोतिरहः शुक्ल : षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥*


जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि - अभिमानी देवता है , दिनका अभिमानी देवता है , शुक्लपक्षका अभिमानी

देवता है और उत्तरायणके छ : महीनों का अभिमानी देवता है , उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाये जाकर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ 


*धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥* 


जिस मार्गमें धूमाभिमानी देवता है , रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्षका अभिमानी देवता है और दक्षिणायनके छः महीनोंका अभिमानी देवता है , उस मार्गमें मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगी उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले गया हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभकर्मोंका फल भोगकर वापस आता है ॥ २५ ॥ 


*शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥*

 क्योंकि जगत्के ये दो प्रकारके - शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक के द्वारा गया हुआ * -जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता , उस परम गतिको प्राप्त होता  है और दूसरे के द्वारा गया हुआ फिर वापस आता है अर्थात् जन्म - मृत्युको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥


*नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥*


हे पार्थ ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता । इस कारण हे अर्जुन ! तू सब कालमें समबुद्धि रूप योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर मेरी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाला हो ॥२७ ॥


*वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥* 


योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ , तप और दानादिके करनेमें जो पुण्यफल ककहा है , उन सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपदको प्राप्त होता है ॥२८ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥*

Saturday, May 29, 2021

अध्याय सप्तम

 *श्रीगीताजी* सातवां अध्याय


*श्रीभगवान्ने छठे अध्याय के छियालीसवें श्लोकमें योगीकी महिमा कही और सैंतालीसवें श्लोकमें कहा कि योगियोंमें भी जो मुझमें श्रद्धा - प्रेम करके मेरा भजन करते हैं , वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं । भक्तोंको जैसे भगवान्की याद आती है तो वे उसमें तल्लीन हो जाते हैं - मस्त हो जाते हैं , ऐसे ही भगवान्के सामने भक्तोंका विशेष प्रसंग आता है तो भगवान् उसमें मस्त हो जाते हैं । इसी मस्तीमें सराबोर होते हुए भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सातवें अध्यायका विषय अपनी तरफसे प्रारम्भ कर देते हैं ।*


*अथ सप्तमोऽध्यायः* 


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।

_________________________

*श्रीभगवानुवाच* 


*मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥*


श्रीभगवान् बोले - हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति , बल , ऐश्वर्यादि गुणोंसे युक्त , सबके आत्मरूप मुझको संशय रहित जानेगा , उसको सुन ॥१॥ 


*ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥*  


मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा , जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेष नहीं रह जाता ॥ २ ॥ 


*मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥*


हजारों मनुष्योंमें कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्वसे अर्थात् यथार्थरूपसे जानता है ॥३॥ 


*भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥* 


पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , मन , बुद्धि और अहंकार भी इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति है । यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो ! इससे दूसरीको , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है , मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान ॥४-५ ॥ 


*एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥*


हे अर्जुन ! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ ॥ ६ ॥ 


*मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।*


हे धनञ्जय ! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् सूत्रमें सूत्रके मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है ॥ ७ ॥ 


*रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥*


हे अर्जुन ! मैं जल में रस हूँ , चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ , सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ , आकाश में शब्द और पुरुषोंमें पुरुषत्व हूँ ॥८॥ 


*पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥* 


मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्निमें तेज हूँ

तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियोंमें तप हूँ॥९॥ 


*बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥* 


हे अर्जुन ! तू सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मुझको ही जान । मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ ॥१० ॥ 


*बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।*


हे भरतश्रेष्ठ ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम हूँ ॥११॥ 


*ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥* 


और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं , उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान , परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं ॥ १२ ॥ 


*त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥* 


गुणोंके कार्यरूप सात्त्विक , राजस और तामस इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार प्राणि समुदाय मोहित हो रहा है , इसीलिये इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशीको नहीं जानता ॥१३॥


*दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥*


क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है ; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं , वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं ॥१४॥ 


*न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥*


मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर - स्वभावको धारण किये हुए , मनुष्योंमें नीच , दूषित कर्म करनेवाले मूढलोग मुझको नहीं भजते ॥१५॥ 


*चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।*


हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले

अर्थार्थी ' , आर्त ' , जिज्ञासु और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं ॥१६ ॥ 


*तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥*


उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है , क्योंकि मुझको तत्त्व से जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १७ ॥ 


*उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥* 


ये सभी उदार हैं , परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है - ऐसा मेरा मत है ; क्योंकि वह मद्गत मन - बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है ॥ १८ ॥ 


*बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥*


बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त

पुरुष , सब कुछ वासुदेव ही है - इस प्रकार मुझको भजता है , वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १ ९ ॥ 


*कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता : स्वया ।* 


उन - उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है , वे लोग अपने स्वभावसे प्रेरित होकर उस - उस नियमको धारण करके अन्य देवताओंको भजते हैं अर्थात् पूजते हैं ॥२०॥ 


*यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥*


जो - जो सकाम भक्त जिस - जिस देवताके स्वरूपको श्रद्धासे पूजना चाहता है , उस - उस भक्तकी श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ ॥२१॥ 


*स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥* 


वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवतासे मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगोंको निःसन्देह प्राप्त करता है ॥२२॥ 


*अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥*  


परन्तु उन अल्प बुद्धिवालोंका वह फल नाशवान् है तथा वे देवताओंको पूजनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें , अन्तमें वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥ 


*अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥*


बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भावको न जानते हुए मन - इन्द्रियोंसे परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी भाँति जन्मकर व्यक्तिभावको प्राप्त हुआ मानते हैं ॥२४ ॥ 


*नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥*


अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता , इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वरको नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने - मरनेवाला समझता है ॥ २५ ॥ 


*वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥*


हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमानमें स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतोंको मैं जानता हूँ , परन्तु भारत मुझको कोई भी श्रद्धा - भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता ॥ २६ ॥ 


*इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥*


हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख - दुःखादि द्वन्द्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं ॥ २७ ॥ 


*येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥* 


परन्तु निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है , वे राग द्वेषजनित द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्त दृढनिश्चयी भक्त मुझको सब प्रकारसे भजते हैं ॥ २८॥ 


*जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चाखिलम् ॥* 


जो मेरे शरण होकर जरा और मरणसे छूटनेके लिये यत्न करते हैं , वे पुरुष उस ब्रह्मको , सम्पूर्ण अध्यात्मको , सम्पूर्ण कर्मको जानते हैं ॥ २ ९ ॥ 


*साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥*


जो पुरुष अधिभूत और अधिदैवके सहित तथा अधियज्ञके सहित ( सबका आत्मरूप ) मुझे अन्तकालमें भी जानते हैं , वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात् प्राप्त हो जाते हैं ॥ ३० ॥ ॐ 


*तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥*