Monday, May 31, 2021

अध्याय दशम

 *(श्री गीताजी दसवां अध्याय )*


*गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए।*


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशंमेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।


*श्रीगीताजी* ( दसवां अध्याय) 


*अथ दशमोऽध्यायः* ( श्रीगीताजी दसवां अध्याय ) 


*श्रीभगवानुवाच* 


*भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥*


श्री भगवान् बोले - हे महाबाहो ! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन , जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवाले के लिये हित की इच्छासे कहूँगा ॥१॥ 


*न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥*


मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते  हैं , क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियोंका भी आदिकारण हूँ ॥२॥ 


*यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥* 


जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित , अनादि और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है , वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ॥३ ॥ 


*बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च । अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥*


निश्चय करने की शक्ति , यथार्थ ज्ञान , असम्मूढ़ता , क्षमा , सत्य , इन्द्रियों का वशमें करना , मनका निग्रह तथा सुख - दुःख , उत्पत्ति - प्रलय और भय - अभय तथा अहिंसा , समता , सन्तोष , तप , दान , कीर्ति और अपकीर्ति - ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं ॥ ४-५ ॥


*जो पुरुष महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥*


सात महर्षिजन , चार उनसे भी पूर्व में होनेवाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु - ये मुझमें भाव वाले सब - के - सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं , जिनकी संसार में यह सम्पूर्ण प्रजा है ॥६ ॥ 


*एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥* 


मेरी इस परमैश्वर्य रूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है — इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ ७ ॥ 


*अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥* 


मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत की उत्पत्तिका कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है , इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्तिसे युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वरको ही निरन्तर भजते हैं ॥८॥


*मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥*


निरन्तर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करनेवाले  भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित मेरा कथन करते हुए ही निरन्तर सन्तुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरन्तर रमण करते हैं ॥९ ॥


*तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥*


उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ , जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥१० ॥ 


*तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥*


हे अर्जुन ! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिये उनके अन्तःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप

दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ ॥११॥ 


*अर्जुन उवाच* 


*परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षि रदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥* 


अर्जुन बोले - आप परम ब्रह्म , परम धाम और परम पवित्र हैं , क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन , दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव , अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं । वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं॥१२-१३ ॥ 


*सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥* 


हे केशव ! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं , इस सबको मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन् ! आपके लीलामय स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही ॥१४ ॥


*स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥*


हे भूतों को उत्पन्न करनेवाले ! हे भूतोंके ईश्वर ! हे देवोंके देव ! हे जगत्के स्वामी ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपनेसे अपनेको जानते हैं ॥१५ ॥ 


*वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥*


इसलिये आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियोंको सम्पूर्णतासे कहनेमें समर्थ हैं , जिन विभूतियोंके द्वारा आप इन सब लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं ॥१६ ॥ 


*कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ।*


हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन् ! आप किन - किन भावोंमें मेरेद्वारा चिन्तन करनेयोग्य हैं ? ॥ १७ ॥ 


*विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥*


हे जनार्दन ! अपनी योगशक्तिको और विभूतिको फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये , क्योंकि आपके अमृतमय वचनोंको सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुननेकी उत्कण्ठा बनी ही रहती है ॥१८ ॥ 


*श्रीभगवानुवाच*


*हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥* 


श्री भगवान् बोले - हे कुरुश्रेष्ठ ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं , उनको तेरे लिये प्रधानतासे कहूँगा ; क्योंकि मेरे विस्तारका अन्त नहीं है ॥१ ९ ॥ 


*अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।* 


हे अर्जुन ! मैं सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतोंका आदि , मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ ॥२० ॥ 


*आदित्यानामहं विष्णुर्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥*


मैं अदितिके बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियोंमें किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ ॥२१ ॥ 


*वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥*


मैं वेदोंमें सामवेद हूँ , देवों में इन्द्र हूँ , इन्द्रियोंमें मन हूँ और भूतप्राणियोंकी चेतना अर्थात् जीवनशक्ति हूँ ॥ २२ ॥


*रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥* 


मैं एकादश रुद्रोंमें शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसोंमें धनका स्वामी कुबेर हूँ । मैं आठ वसुओंमें अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतोंमें सुमेरु पर्वत हूँ ॥ २३ ॥ 


*पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥*


पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान । हे पार्थ ! मैं सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें समुद्र हूँ ॥२४ ॥ 


*महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥*


मैं महर्षियोंमें भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ । सब प्रकारके यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय पहाड़ हूँ ॥ २५ ॥ 


*अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ।* 


मैं सब वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष , देवर्षियोंमें नारद मुनि , गन्धर्वो में चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ ॥२६ ॥ 


*उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥* 


घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा , श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्योंमें राजा मुझको जान ॥२७॥ 


*आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥* 


मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ । शास्त्रोक्त रीतिसे सन्तान की उत्पत्तिका हेतु कामदेव हूँ और सर्पोमें सर्पराज वासुकि हूँ ॥२८ ॥ 


*अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥*


 मैं नागों में शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ ॥२९॥


*प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥*


 मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियोंमें मैं गरुड़ हूँ ॥ ३० ॥


*पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥*


मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्रीभागीरथी गंगाजी हूँ ॥३१ ॥ 


*सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥*


हे अर्जुन ! सृष्टियोंका आदि और अन्त तथा मध्य भी मैं ही हूँ । मैं विद्याओंमें अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करनेवालोंका तत्त्व - निर्णयके लिये किया जानेवाला वाद हूँ ॥ ३२ ॥


*अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥*


मैं अक्षरोंमें अकार हूँ और समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ । अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला , विराट्स्वरूप , सबका धारण - पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ ॥ ३३ ॥ 


*मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥*


मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियोंमें कीर्ति ' , श्री , वाक् , स्मृति , मेधा , धृति और क्षमा हूँ ॥ ३४ ॥ 


*बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥*


तथा गायन करनेयोग्य श्रुतियोंमें मैं बृहत्साम और छन्दोंमें गायत्री छन्द हूँ तथा महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ ॥ ३५ ॥


*द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥*


मैं छल करनेवालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ । मैं जीतने वालों का विजय हूँ , निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषोंका सात्त्विक भाव हूँ ॥३६॥ 


वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ 


वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा , पाण्डवोंमें धनञ्जय अर्थात् तू , मुनियोंमें वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ ॥ ३७ ॥


दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥


मैं दमन करनेवालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ , जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ , गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ ॥३८॥ 


*यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥*


और हे अर्जुन ! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका कारण है , वह भी मैं ही हूँ ; क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है , जो मुझसे रहित हो ॥३९॥ 


*नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥*


हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है , मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे कहा है ॥४०॥ 


*यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥* 


जो - जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त ,कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है , उस - उसको तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान ॥ ४१ ॥ 


*अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥*

अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है । मैं इस सम्पूर्ण जगत्को अपनी योगशक्ति के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ ॥ ४२ ॥ 


*ॐतत्सदितिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥*

अध्याय नवम

 *अथ नवमोऽध्यायः* ( गीताजी नवम अध्याय )  


*अथध्यानम्* ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुंभवभयहरंसर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेद के गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदों के सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यान में स्थित तद्गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥* 


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकी के आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।

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*श्रीभगवानुवाच* 

*इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥* 


श्री भगवान् बोले - तुझ दोषदृष्टि रहित भक्त के लिये इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा,जिसको जानकर तू दुःख रूप संसार से मुक्त हो जायगा ॥१॥ 


*राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥*


यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा , सब गोपनीयों का राजा , अतिपवित्र , अतिउत्तम , प्रत्यक्ष फलवाला , धर्मयुक्त , साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है ॥२॥ 


*अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥*


हे परंतप ! इस उपर्युक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसारचक्र में भ्रमण करते रहते हैं ॥३॥


*मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥*


मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बरफ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्पके आधार स्थित हैं , किन्तु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ ॥४॥ 


*न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥*


वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं ; किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण - पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है ॥५॥ 


*यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥* 


जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है , वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं , ऐसा जान ॥६॥ 


*सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥*


हे अर्जुन ! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ ॥७॥


*प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥*


अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को बार - बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ ॥८ ॥ 


*न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥* 


हे अर्जुन ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते ॥९॥ 


*मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥*


हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति चराचरसहित सर्व जगत्को रचती है और इस हेतुसे ही यह संसारचक्र घूम रहा है ॥ १० ॥ 


*अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥*


मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़लोग मनुष्य का

शरीर धारण करने वाले मुझ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योगमाया से संसारके उद्धार के लिये मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वरको साधारण मनुष्य मानते हैं ॥ ११ ॥ 


*मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥*


वे व्यर्थ आशा , व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी , आसुरी और मोहिनी प्रकृतिको ही धारण किये रहते हैं ॥१२॥ 


*महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः।भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥* 


परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! दैवी प्रकृतिके आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतोंका सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरन्तर भजते हैं ॥१३॥


*सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥*


वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हुए और मुझको बार - बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं ॥१४॥ 


*ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥* 


दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण - निराकार ब्रह्मका ज्ञानयज्ञ के द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकारसे स्थित मुझ विराट्स्वरूप परमेश्वरकी पृथक् भावसे उपासना करते हैं ॥१५॥ 


*अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥* 


क्रतु मैं हूँ , यज्ञ मैं हूँ , स्वधा मैं हूँ , ओषधि मैं हूँ , मन्त्र मैं हूँ , घृत मैं हूँ , अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ ॥१६ ॥


पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । 

वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च । 


इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात् धारण करने वाला एवं कर्मो के फलको देनेवाला , पिता , माता , पितामह , जानने योग्य ,पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद , सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ ॥१७॥ 


*गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभव : प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥*


प्राप्त होने योग्य परम धाम , भरण - पोषण करनेवाला , सबका स्वामी , शुभाशुभ का देखने वाला , सबका वासस्थान , शरण लेने योग्य , प्रत्युपकार न चाहकर हित करनेवाला , सबकी उत्पत्ति - प्रलय का हेतु , स्थिति का आधार , निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ ॥१८ ॥ 


*तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥*


मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ , वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ । हे अर्जुन ! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत् - असत् भी मैं ही हूँ ॥१८ ॥


*विद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मनन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥*


तीनों वेदोंमें विधान किये हुए सकाम कर्मों को करने वाले , सोमरस को पीनेवाले , पापरहित पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं ; वे पुरुष अपने पुण्योंके फलरूप स्वर्गलोकको प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगोंको भोगते हैं ॥ २० ॥ 


*ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥*


वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं । इस प्रकार स्वर्ग के साध नरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्मका आश्रय लेनेवाले और भोगों की कामनावाले पुरुष बार - बार आवागमनको प्राप्त होते हैं , अर्थात् पुण्यके प्रभाव से स्वर्गमें जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आते हैं ॥ २१ ॥ यहाँ स्वर्गप्राप्ति के प्रतिबन्धक देवऋणरूप पापसे पवित्र होना समझना चाहिये । 


*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥*


जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं , उन नित्य - निरन्तर मेरा चिन्तन करनेवाले पुरुषोंका योगक्षेम  मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ ॥ २२ ॥ 


*येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥* 


हे अर्जुन ! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं , वे भी मुझको ही पूजते हैं ; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है ॥ २३ ॥ 


*अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥*


क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ ; परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्वसे नहीं जानते , इसीसे गिरते हैं अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥


*यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥* 


देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं , पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं , भूतों को पूजनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं । इसलिये मेरे भक्तोंका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ २५ ।। 


*पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥* 


जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र , पुष्प , फल , जल आदि अर्पण करता है , उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र - पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ ॥२६॥ 


*यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥* 


हे अर्जुन ! तू जो कर्म करता है , जो खाता है , जो हवन करता है , जो दान देता है और जो तप करता है , वह सब मेरे अर्पण कर ॥२७ ॥ 


*शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥*


इस प्रकार , जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते हैं - ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धन से मुक्त हो जायगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा ॥ २८ ॥ 


*समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥* 


सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ , न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है ; परन्तु जो भक्त मुझको प्रेमसे भजते हैं , वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ ।२९। 


*अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥*


यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है ; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है । अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि 

- परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है ॥ ३० ॥ 


*क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥* 


वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्तिको प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता ॥३१॥ 


*मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥* 


हे अर्जुन ! स्त्री , वैश्य , शूद्र तथा पापयोनि चाण्डाला दि जो कोई भी हों , वे भी मेरे शरण होकर परमगतिको ही प्राप्त होते हैं ॥३२॥


*किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥*


फिर इसमें तो कहना ही क्या है , जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होते हैं । इसलिये तू सुखरहित और क्षणभङ्गुर इस मनुष्य शरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर ॥ ३३ ॥ 


*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥*


मुझ में मन वाला हो , मेरा भक्त बन , मेरा पूजन करनेवाला हो , मुझको प्रणाम कर इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा ॥ ३४ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः॥९॥*

Sunday, May 30, 2021

अध्याय अष्टम

 *श्रीगीताजी आठवां अध्याय* 


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं 

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । 

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ 


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।


*अथाष्टमोऽध्यायः* 


अर्जुन उवाच


*किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥* 


अर्जुनने कहा - हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत नामसे क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं ॥१ ॥ 


*अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥* 


हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है ? और वह इस शरीर में कैसे है ? तथा युक्तचित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाननेमें आते हैं ॥२ ॥ 


श्रीभगवानुवाच 


*अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः॥* 


श्रीभगवान्ने कहा - परम अक्षर ' ब्रह्म ' है , अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा ' अध्यात्म ' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है , वह ' कर्म ' नाम से कहा गया है ॥ ३ ॥ 


*अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥* 


उत्पत्ति - विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं , हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीरमें मैं वासुदेव ही अन्तर्यामीरूपसे अधियज्ञ हूँ ॥४ ॥ 


*अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥* 


जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है , वह मेरे साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है - इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५॥ 


*यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥* 


हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस 


जिस भी भावको स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता है , उस - उसको ही प्राप्त होता है ; क्योंकि वह सदा उसी भावसे भावित रहा है ॥६ ॥ 


*तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥*


इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन - बुद्धिसे युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा ॥ ७ ॥


*अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥* 


हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योग से युक्त , दूसरी ओर न जाने वाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुषको अर्थात् परमेश्वरको ही प्राप्त होता है ।॥ ८ ॥


*कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥* 


जो पुरुष सर्वज्ञ , अनादि , सबके नियन्ता , सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म , सबके धारण - पोषण करनेवाले अचिन्त्यस्वरूप , सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे , शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है॥९॥ 


*प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥*


वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके , फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है ॥१० ॥


*यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥*


वेदके जाननेवाले विद्वान् जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं , आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं , उस परमपदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा ॥११ ॥ 


*सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥*


सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके , फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राणको मस्तक में स्थापित करके , परमात्म सम्बन्धी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ' ॐ ' इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है , वह पुरुष परमगतिको प्राप्त होता है ॥

 १२-१३ ॥ 


*अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥*


हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है , उस नित्य - निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ , अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ॥ १४ ॥ 


*मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ॥*


परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते ॥ १५ ॥ 


*आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥*


हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्ती हैं , परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं ॥१६ ॥ 


*सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥*


ब्रह्माका जो एक दिन है , उसको एक हजार चतुर्युगीतक की अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं , वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैं ॥१७ ॥


*अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्जके ॥*


सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्मशरीर में ही लीन हो जाते हैं ॥ १८ ॥ 


*भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥*


हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो होकर प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता है ॥१ ९ ॥ 


*परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥*


उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्तभाव है , वह परम दिव्य पुरुष सब भूतोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता ॥ २० ॥


*अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥*


जो अव्यक्त ' अक्षर ' इस नामसे कहा गया है , उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते , वह मेरा परम धाम है ॥ २१ ॥ 


*पुरुषः स पर : पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥*


हे पार्थ ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत् परिपूर्ण है , वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है ॥ २२ ॥ 


*यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।*


हे अर्जुन ! जिस कालमें शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन तो वापस न लौटनेवाली गतिको और जिस कालमें गये हुए वापस लौटनेवाली गतिको ही प्राप्त होते हैं , उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको कहूँगा ॥ २३ ॥ 


*अग्निोतिरहः शुक्ल : षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥*


जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि - अभिमानी देवता है , दिनका अभिमानी देवता है , शुक्लपक्षका अभिमानी

देवता है और उत्तरायणके छ : महीनों का अभिमानी देवता है , उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाये जाकर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ 


*धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥* 


जिस मार्गमें धूमाभिमानी देवता है , रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्षका अभिमानी देवता है और दक्षिणायनके छः महीनोंका अभिमानी देवता है , उस मार्गमें मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगी उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले गया हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभकर्मोंका फल भोगकर वापस आता है ॥ २५ ॥ 


*शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥*

 क्योंकि जगत्के ये दो प्रकारके - शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक के द्वारा गया हुआ * -जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता , उस परम गतिको प्राप्त होता  है और दूसरे के द्वारा गया हुआ फिर वापस आता है अर्थात् जन्म - मृत्युको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥


*नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥*


हे पार्थ ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता । इस कारण हे अर्जुन ! तू सब कालमें समबुद्धि रूप योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर मेरी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाला हो ॥२७ ॥


*वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥* 


योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ , तप और दानादिके करनेमें जो पुण्यफल ककहा है , उन सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपदको प्राप्त होता है ॥२८ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥*

Saturday, May 29, 2021

अध्याय सप्तम

 *श्रीगीताजी* सातवां अध्याय


*श्रीभगवान्ने छठे अध्याय के छियालीसवें श्लोकमें योगीकी महिमा कही और सैंतालीसवें श्लोकमें कहा कि योगियोंमें भी जो मुझमें श्रद्धा - प्रेम करके मेरा भजन करते हैं , वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं । भक्तोंको जैसे भगवान्की याद आती है तो वे उसमें तल्लीन हो जाते हैं - मस्त हो जाते हैं , ऐसे ही भगवान्के सामने भक्तोंका विशेष प्रसंग आता है तो भगवान् उसमें मस्त हो जाते हैं । इसी मस्तीमें सराबोर होते हुए भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सातवें अध्यायका विषय अपनी तरफसे प्रारम्भ कर देते हैं ।*


*अथ सप्तमोऽध्यायः* 


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।

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*श्रीभगवानुवाच* 


*मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥*


श्रीभगवान् बोले - हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति , बल , ऐश्वर्यादि गुणोंसे युक्त , सबके आत्मरूप मुझको संशय रहित जानेगा , उसको सुन ॥१॥ 


*ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥*  


मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा , जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेष नहीं रह जाता ॥ २ ॥ 


*मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥*


हजारों मनुष्योंमें कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्वसे अर्थात् यथार्थरूपसे जानता है ॥३॥ 


*भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥* 


पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , मन , बुद्धि और अहंकार भी इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति है । यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो ! इससे दूसरीको , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है , मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान ॥४-५ ॥ 


*एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥*


हे अर्जुन ! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ ॥ ६ ॥ 


*मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।*


हे धनञ्जय ! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् सूत्रमें सूत्रके मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है ॥ ७ ॥ 


*रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥*


हे अर्जुन ! मैं जल में रस हूँ , चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ , सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ , आकाश में शब्द और पुरुषोंमें पुरुषत्व हूँ ॥८॥ 


*पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥* 


मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्निमें तेज हूँ

तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियोंमें तप हूँ॥९॥ 


*बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥* 


हे अर्जुन ! तू सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मुझको ही जान । मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ ॥१० ॥ 


*बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।*


हे भरतश्रेष्ठ ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम हूँ ॥११॥ 


*ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥* 


और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं , उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान , परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं ॥ १२ ॥ 


*त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥* 


गुणोंके कार्यरूप सात्त्विक , राजस और तामस इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार प्राणि समुदाय मोहित हो रहा है , इसीलिये इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशीको नहीं जानता ॥१३॥


*दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥*


क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है ; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं , वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं ॥१४॥ 


*न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥*


मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर - स्वभावको धारण किये हुए , मनुष्योंमें नीच , दूषित कर्म करनेवाले मूढलोग मुझको नहीं भजते ॥१५॥ 


*चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।*


हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले

अर्थार्थी ' , आर्त ' , जिज्ञासु और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं ॥१६ ॥ 


*तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥*


उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है , क्योंकि मुझको तत्त्व से जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १७ ॥ 


*उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥* 


ये सभी उदार हैं , परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है - ऐसा मेरा मत है ; क्योंकि वह मद्गत मन - बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है ॥ १८ ॥ 


*बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥*


बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त

पुरुष , सब कुछ वासुदेव ही है - इस प्रकार मुझको भजता है , वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १ ९ ॥ 


*कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता : स्वया ।* 


उन - उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है , वे लोग अपने स्वभावसे प्रेरित होकर उस - उस नियमको धारण करके अन्य देवताओंको भजते हैं अर्थात् पूजते हैं ॥२०॥ 


*यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥*


जो - जो सकाम भक्त जिस - जिस देवताके स्वरूपको श्रद्धासे पूजना चाहता है , उस - उस भक्तकी श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ ॥२१॥ 


*स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥* 


वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवतासे मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगोंको निःसन्देह प्राप्त करता है ॥२२॥ 


*अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥*  


परन्तु उन अल्प बुद्धिवालोंका वह फल नाशवान् है तथा वे देवताओंको पूजनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें , अन्तमें वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥ 


*अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥*


बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भावको न जानते हुए मन - इन्द्रियोंसे परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी भाँति जन्मकर व्यक्तिभावको प्राप्त हुआ मानते हैं ॥२४ ॥ 


*नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥*


अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता , इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वरको नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने - मरनेवाला समझता है ॥ २५ ॥ 


*वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥*


हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमानमें स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतोंको मैं जानता हूँ , परन्तु भारत मुझको कोई भी श्रद्धा - भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता ॥ २६ ॥ 


*इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥*


हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख - दुःखादि द्वन्द्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं ॥ २७ ॥ 


*येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥* 


परन्तु निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है , वे राग द्वेषजनित द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्त दृढनिश्चयी भक्त मुझको सब प्रकारसे भजते हैं ॥ २८॥ 


*जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चाखिलम् ॥* 


जो मेरे शरण होकर जरा और मरणसे छूटनेके लिये यत्न करते हैं , वे पुरुष उस ब्रह्मको , सम्पूर्ण अध्यात्मको , सम्पूर्ण कर्मको जानते हैं ॥ २ ९ ॥ 


*साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥*


जो पुरुष अधिभूत और अधिदैवके सहित तथा अधियज्ञके सहित ( सबका आत्मरूप ) मुझे अन्तकालमें भी जानते हैं , वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात् प्राप्त हो जाते हैं ॥ ३० ॥ ॐ 


*तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥*

अध्याय षष्टम

 *श्रीभगवतगीता* ( छठा अध्याय ) 


पाँचवें अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने यह बात पूछी थी कि *सांख्ययोग और कर्मयोग - इन दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है ?* 


इसके उत्तर में भगवान्ने कहा कि ये दोनों ही कल्याण करने वाले हैं ; परन्तु कर्मसंन्यास और कर्मयोग - *इन दोनोंमें कर्मयोग श्रेष्ठ* है - ' *तयोस्तु कर्मसन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ' ( ५।२ ) ।*


अब दोनों कल्याण करने वाले कैसे हैं - इसका वर्णन भगवान्ने पाँचवें अध्याय के छब्बीस वें श्लोक तक किया । फिर सांख्ययोग तथा कर्मयोगके लिये उपयोगी और स्वतन्त्रतासे कल्याण करनेवाले ध्यानयोगका संक्षेपसे दो श्लोकोंमें वर्णन किया तथा अन्तमें अपनी ही तरफसे भक्तिकी निष्ठा बताकर पाँचवें अध्यायके विषयका उपसंहार किया । 


*अब पुनः कर्मयोग की श्रेष्ठता बतानेके लिये भगवान् छठे अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं* ।


*अथ ध्यानम्*

( गीताजी के पाठ से पहले  इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*


अर्थ - कंस और चाणूर का वध करने वाले , देवकी के आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।

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*श्रीभगवानुवाच*


*अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥*


श्री भगवान् बोले - जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है , वह भी संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करनेवाला योगी नहीं है ॥ १ ॥ 


*यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥*


हे अर्जुन ! जिसको संन्यास ' ऐसा कहते हैं , उसी को तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता ॥२ ॥ 


*आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥* 


योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मनन शील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है , वही कल्याण में हेतु कहा जाता है ॥ ३ ॥ 


*यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥* 


जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है , उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है ॥ ४ ॥


*उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥*


अपने द्वारा अपना संसार - समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले ; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ॥५ ॥ 


*बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥* 


जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है , उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है , उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुता में बर्तता है ॥६॥


*जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥*


सरदी - गरमी और सुख - दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्त : करणकी वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं , ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित है अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं ॥७ ॥ 


*ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥*


जिसका अन्त : करण ज्ञान - विज्ञानसे तृप्त है , जिसकी स्थिति विकाररहित है , जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी , पत्थर और सुवर्ण समान हैं , वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है , ऐसे कहा जाता है ॥८ ॥

 

*सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥* 


सुहृद् , मित्र , वैरी , उदासीन , मध्यस्थ , द्वेष्य और बन्धुगणोंमें , धर्मात्माओंमें और पापियोंमें भी समान भाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ 


*योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥* 


मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वशमें रखने वाला , आशारहित और संग्रह रहित योगी अकेला ही एकान्त स्थानमें स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मा में लगावे ॥१० ॥


*शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥* 


शुद्ध भूमि में , जिसके ऊपर क्रमश : कुशा , मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं , जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा , ऐसे अपने आसनको स्थिर स्थापन करके -॥११ ॥ 


*तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥* 


उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वशमें रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्त : करणकी शुद्धिके लिये योग का अभ्यास करे ॥१२ ॥ 


*समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥* 


काया , सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर , अपनी नासिकाके अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर , अन्य दिशाओं को न देखता हुआ- ॥१३ ॥ 


*प्रशान्तात्माविगत भीब्रह्मचारिखते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥* 


ब्रह्मचारीके व्रत में स्थित , भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्त : करण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे ॥१४॥ 


*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्ति निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥*


वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता हुआ मुझमें रहनेवाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्तिको प्राप्त होता है ॥१५॥ 


*नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्रतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।* 


हे अर्जुन ! यह योग न तो बहुत खाने वालेका , न बिलकुल न खानेवालेका , न बहुत शयन करनेके स्वभाववालेका और न सदा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है ॥ १६ ॥ 


*युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥* 


दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार - विहार करनेवालेका , कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवाले का ही सिद्ध होता है ॥ १७ ॥


*यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥* 


अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है , उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है , ऐसा कहा जाता है ॥ १८ ॥ 


*यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥* 


जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलाय मान नहीं होता , वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तकी कही गयी है ॥१ ९ ॥ 


*यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥* 


योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही सन्तुष्ट रहता है ॥२० ॥


*सुखमात्यन्तिकं यत्तबुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।*


इन्द्रियोंसे अतीत , केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द है ; उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूपसे विचलित होता ही नहीं ॥ २१ ॥ 


*यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥* 


परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता ॥ २२ ।। 


*तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥*


जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है ; उसको जानना चाहिये । वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है ॥ २३ ॥ 


*सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥*


संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को नि:शेषरूप से त्यागकर और मन के द्वारा इन्द्रियोंके समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर- ॥२४ ॥ 


*शनैः शनैरुपरमेबुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥*


क्रम - क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे ॥ २५ ॥


*यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥*

यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे संसारमें विचरता है , उस - उस विषयसे रोककर यानी हटाकर इसे बार - बार परमात्मामें ही निरुद्ध करे ॥ २६ ॥ 


*प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥*


क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है , जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है , ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है ॥ २७ ॥

 

*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥*


वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनुभव करता है ॥२८ ॥


*सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥*


सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है ॥ २ ९ ॥ 


*यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥*


जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत  देखता है , उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ॥ ३० ॥


*सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥* 


जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है , वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है ॥ ३१ ॥


*आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥* 


हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दु : खको भी सबमें सम देखता है , वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है ॥ ३२ ॥ 


*अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥* 


अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! जो यह योग आपने समभावसे कहा है , मनके चञ्चल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ ॥ ३३ ॥ 


*चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥*


क्योंकि हे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा चञ्चल , प्रमथन स्वभाववाला , बड़ा दृढ़ और बलवान् है । इसलिये उसका वशमें करना मैं वायुको रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ ॥ ३४ ॥


*श्रीभगवानुवाच* 


*असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥*


श्रीभगवान् बोले - हे महाबाहो ! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनता से वशमें होनेवाला है ; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें हो जाता है ॥३५ ॥ 


*असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥*

जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है , ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है - यह मेरा मत है ॥ ३६ ॥


*अर्जुन उवाच* 


*अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥*


अर्जुन बोले - हे श्रीकृष्ण ! जो योग में श्रद्धा रखनेवाला है ; किन्तु संयमी नहीं है , इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥


*कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥*


हे महाबाहो ! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रय रहित पुरुष छिन्न - भिन्न बादल की भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता ? ॥ ३८ ॥


*एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥*


हे श्रीकृष्ण ! मेरे इस संशयको सम्पूर्णरूपसे छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं , क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है ॥ ३ ९ ॥


*श्रीभगवानुवाच*


*पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति ॥*


श्रीभगवान् बोले - हे पार्थ ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही । क्योंकि हे प्यारे ! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता ॥ ४० ॥


*प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती : समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥* 


योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर , उनमें बहुत वर्षांतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है ॥ ४१ ॥ 


*अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥*


अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है । परन्तु इस प्रकारका जो यह जन्म है , सो संसारमें निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है ॥४२ ॥ 


*तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥* 


वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि संयोग को अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है । 

 

*पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥* 


वह  श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निःसन्देह भगवान्की ओर आकर्षित किया जाता है , तथा समबुद्धिरूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मोके फल को उल्लंघन कर जाता है ॥४४ ॥ 


*प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥* 


परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो फिर तत्काल ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है ।४५॥ 


*तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥*


योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है , शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है ; इससे हे अर्जुन ! तू योगी हो ॥ ४६ ॥ 


*योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥* 


सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है , वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है ॥४७ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥*

अध्याय पंचम

अध्याय तृतीय

 श्रीभगवतगीता अथ तृतीयोऽध्यायः 


अर्जुन उवाच

*ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।*

*तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥*


अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! यदि आप को कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं ? ॥१॥


*व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धि मोहयसीव मे ।*

*तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥*


आप मिले हुए - से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं । इसलिये उस एक बात को निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ ॥२ ॥ 


श्रीभगवानुवाच 


*लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।* 

*ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥*


श्रीभगवान् बोले - हे निष्पाप ! इस लोक में दो प्रकारकी निष्ठा ' मेरे द्वारा पहले कही गयी है । उनमें से सांख्ययोगियों की निष्ठा तो ज्ञानयोग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है ॥३ ॥


*न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्रुते ।*

*न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥* 


मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको  यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठाको ही प्राप्त होता है ॥४॥ 


*न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।*

*कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥* 


निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता ; क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिये बाध्य किया जाता है ॥५ ॥ 


*कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।*

*इन्द्रियान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥*


जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयों का चिन्तन करता रहता है , वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है ॥६ ॥


*यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।* 

*कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥*


किन्तु हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है , वही श्रेष्ठ है ॥७ ॥ 


*नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।*

*शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥*


तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर ; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर - निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।॥८॥ 


*यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।*

*तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥* 


यज्ञ के निमित्त किये जानेवाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे  बँधता है । इसलिये हे अर्जुन ! तू आसक्तिसे रहित होकर उस यज्ञके निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्यकर्म कर ॥९ ॥


*सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।*

*अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥* 


प्रजापति ब्रह्मा ने कल्पके आदिमें यज्ञसहित प्रजाओंको रचकर उनसे कहा कि तुमलोग इस  यज्ञ के द्वारा वृद्धिको प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगों को इच्छित भोग प्रदान करनेवाला हो ॥१०॥ 


*देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।* 

*परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।*


तुम लोग इस यज्ञके द्वारा देवताओंको उन्नत करो और वे देवता तुमलोगों को उन्नत करें । इस प्रकार नि : स्वार्थभावसे एक - दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ॥११ ॥ 


*इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।*

 *तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥*


यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे । इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता है , वह चोर ही है ॥१२॥ 


*यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।* 

*भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥* 


यज्ञ से बचे हुए अन्न को खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर - पोषण करनेके लिये ही अन्न पकाते हैं , वे तो पाप को ही खाते हैं ॥ १३ ॥


*अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।*

*यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥*


*कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।*

*तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥*


सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं , अन्नकी उत्पत्ति वृष्टि से होती है , वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होनेवाला है । कर्म समुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान । इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञमें प्रतिष्ठित है॥१४-१५ ॥ 


*एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।* 

*अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥*


हे पार्थ ! जो पुरुष इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता , वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है ॥१६॥ 


*यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।* 

*आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥* 


परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करनेवाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो , उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है ॥१७॥ 


*नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।*

*न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥* 


उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मो के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है । तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता ॥१८॥ 


*तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।* 

*असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥*


इसलिये तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को भलीभाँति करता रह । क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ॥१९॥ 


*कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।*

*लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥*


जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे । इसलिये तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने को ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है॥२०॥


*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।*

*स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥*  


श्रेष्ठ पुरुष जो - जो आचरण करता है , अन्य पुरुष भी वैसा - वैसा ही आचरण करते हैं । वह जो कुछ प्रमाण कर देता है , समस्त मनुष्यसमुदाय उसीके अनुसार बरतने लग जाता है ॥ २१ ॥ 


   *न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥* 


हे अर्जुन ! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है , तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ ॥ २२ ॥ 


*यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।* 

*मम वानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।* 


क्योंकि हे पार्थ ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बड़ी हानि हो जाय ; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं ॥२३॥ 


*उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।*

*सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥*


इसलिये यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट - भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरता का करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूं ॥ २४ ॥


*सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।* *कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥* 


हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं , आसक्तिर हित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे ॥ २५॥ 


*न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥* 


परमात्माके स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्तिवाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात् कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे । किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे ॥२६॥ 


*प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥*


वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण 

अहंकार से मोहित हो रहा है , ऐसा अज्ञानी ' मैं कर्ता हूँ ' ऐसा मानता है ॥ २७ ॥ 


*तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।* 

*गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥* 


परन्तु हे महाबाहो ! गुणविभाग और कर्म विभाग के तत्त्व को जानने वाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं , ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता ॥२८॥ 


*प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।*

*तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥* 


प्रकृति के गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणोंमें और कर्मों में आसक्त रहते हैं , उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी विचलित न करे ॥२९॥ 


*मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।* *निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥*


मुझ अन्तर्यामी परमात्मामें लगे हुए चित्तद्वारा सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके आशारहित , ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर ॥३० ॥


*ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।*

*श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥* 


जो कोई मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मतका सदा अनुसरण करते हैं , वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं ॥३१॥ 


*ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥*


परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मतके अनुसार नहीं चलते हैं , उन मूल्को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ ॥ ३२ ॥ 


*सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।*

*प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥*


सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं । ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है । फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा ? ॥३३ ॥ 


*इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।* 

*तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ।*


इन्द्रिय - इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं । मनुष्यको उन दोनों के वशमें नहीं होना चाहिये , क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले महान् शत्रु हैं ॥३४॥ 


*श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।*

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥*


अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है । अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भयको देनेवाला है ॥ ३५ ॥ 


अर्जुन उवाच 


*अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ।* 


अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुएकी भाँति किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है ? ॥ ३६ ॥ 


श्रीभगवानुवाच


*काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।* 

*महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥*


श्रीभगवान् बोले - रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है , यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगोंसे कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है , इसको ही तू इस विषयमें वैरी जान ॥३७ ॥ 


*धूमेनावियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च । यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥*


जिस प्रकार धूएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेरसे गर्भ ढका रहता है , वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है ॥३८ ॥ 


*आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।*

*कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥*


और हे अर्जुन ! इस अग्निके समान कभी न पूर्ण होने वाले कामरूप ज्ञानियों के नित्य वैरी के द्वारा मनुष्यका ज्ञान ढका हुआ है ।।३९॥ 


*इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।* *एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥*


इन्द्रियाँ , मन और बुद्धि - ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं । यह काम इन मन , बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही ज्ञानको आच्छादित करके जीवात्माको मोहित करता है ॥४० ॥


*तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।*

*पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥* 


इसलिये हे अर्जुन ! तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल ॥४१ ॥ 


*इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।*

*मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥*


इन्द्रियोंको स्थूल शरीरसे पर यानी श्रेष्ठ , बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं ; इन इन्द्रियोंसे पर मन है , मनसे भी पर बुद्धि है और जो बुद्धिसे भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है ॥४२ ॥ 


*एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।* 

*जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥* 


इस प्रकार बुद्धिसे पर अर्थात् सूक्ष्म , बलवान् और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्माको जानकर और बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल ॥ ४३ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे* *श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥*


*श्रीगीताजी का तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ...*.

अध्याय द्वितीय

 *श्रीभगवतगीता* - 

*अथ द्वितीयोऽध्याय्*


श्लोक ( 1 से 49 )  

( श्रीगीताजी  का एक एक शब्द श्रीभगवान की दिव्य वाणी है, इन्हें पढ़ने का मौका हमे, ज् जाने कितने पुण्यों के बाद मिलता है) 


तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । 

विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ 


संजय धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद सुना रहे है--  

की जब अर्जुन मधुसूदन कृष्ण से कहा की वह अपने भाइयों को नही मार सकता तब ---उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा ॥१ ॥ 


श्रीभगवानुवाच ( भगवान अर्जुन से कहते है -) 


कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन


श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित है , न स्वर्गको देनेवाला है और न कीर्ति को करनेवाला ही है ॥२॥


क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । 

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥


इसलिये हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो , तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती । हे परंतप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो जा ॥३॥ II 


अर्जुन उवाच ( अर्जुन पुनः श्रीभगवान से कहते है ) 


कथं भीष्ममहं सख्ये द्रोणं च मधुसूदन । 

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाह्नवरिसूदन ॥ 


अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड्गा ? क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनों ही पूजनीय हैं ॥४ ॥ 


गुरूनहत्वा हि महानुभावा ञ्छ्रेयो 

भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । 

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव 

भुञ्जीय भोगाधिरप्रदिग्धान् ॥ 


इसलिये इन महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं इस लोकमें  भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याण कारक समझता हूँ ; क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूंगा ॥५ ॥ 


न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो 

यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । 

यानेव हत्वा न जिजीविषाम 

स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ 


हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये युद्ध करना और न करना - इन दोनों में से कौन - सा श्रेष्ठ है , अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे । और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते , वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्रके पुत्र हमारे मुकाबलेमें खड़े हैं ॥६ ॥


कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः 

पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । 

यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे 

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।


इसलिये कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो , वह मेरे लिये कहिये ; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ , इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये ॥७॥ 


न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या 

द्यच्छो च्छोषणमिन्द्रियाणाम् । 

अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं 

राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ 


क्योंकि भूमि में निष्कण्टक , धन - धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामी पने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ , जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके ॥८ ॥  


सञ्जय उवाच ( यही सब बातें संजय सुन रहे है, ओर धृतराष्ट्र को बता भी रहें है ) 


एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । 

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ 


संजय बोले - हे राजन् ! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी श्रीकृष्णमहाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्दभगवान्से ' युद्ध नहीं करूँगा ' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये ॥९ ॥ 


तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ 


हे भरतवंशी धृतराष्ट्र ! अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओंके बीचमें शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए - से यह वचन बोले ॥१० ॥ 


श्रीभगवानुवाच ( श्रीभगवान ने अर्जुन से कहा ) 


अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ 


श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन ! 

तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिये शोक करता है और पण्डितोंके - से वचनों को कहता है ; परंतु जिनके प्राण चले गये हैं , उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते ॥११॥


न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । 

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ 


न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था , तू नहीं था अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे ॥१२॥


देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र न मुह्यति ॥ 


जैसे जीवात्माकी इस देह में बालकपन , जवानी और वृद्धावस्था होती है , वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है ; उस विषयमें धीर पुरुष मोहित नहीं होता ॥१३ ॥ 


मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ 


हे कुन्तीपुत्र ! सर्दी - गर्मी और सुख - दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति विनाशशील और अनित्य हैं , इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर ॥१४॥ 


यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । 

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ 


क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख - सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते , वह मोक्ष के योग्य होता है ॥१५॥ 


नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। 

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ 


असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है । इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है ॥१६॥ 


अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ 


नाशरहित तो तू उसको जान , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् - दृश्यवर्ग व्याप्त है । इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है ॥ १७ ॥ 


अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ 


इस नाशरहित , अप्रमेय , नित्यस्वरूप जीवात्माके ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं । इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! तू युद्ध कर ॥१८ ॥


य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।

उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ 


जो इस आत्माको मारने वाला समझता है तथाजो इसको मरा मानता है , वे दोनों ही नहीं जानते ; क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है ॥१९॥ 


न जायते म्रियते वा कदाचि 

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । 

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो 

न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥


यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है ; क्योंकि यह अजन्मा , नित्य , सनातन और पुरातन है ; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता ॥२०॥ 


वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । 

कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ 


हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित , नित्य , अजन्मा और अव्यय जानता है , वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है ? ॥२१ ॥ 


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय 

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । 

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा

न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥


जैसे । मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है , वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरोंको त्यागकर दूसरे नये शरीरोंको प्राप्त होता है ॥ २२॥


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । 

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ 


इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते , इसको आग नहीं जला सकती , इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता ॥२३॥


अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । 

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ 


क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है , यह आत्मा अदाह्य , अक्लेद्य और निःसन्देह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य , सर्वव्यापी , अचल , स्थिर रहनेवाला और सनातन है ॥ २४॥


अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ 


यह आत्मा अव्यक्त है , यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकार रहित कहा जाता है । इससे हे अर्जुन ! इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे जानकर तू शोक करनेको योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है ॥२५ ॥


अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । 

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ 


किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो , तो भी हे महाबाहो ! तू इस प्रकार शोक करनेको योग्य नहीं है ॥२६ ॥ 


जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु वं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 


क्योंकि इस मान्यताके अनुसार जन्मे हुएकी मृत्यु निश्चित है और मरे हुएका जन्म निश्चित है । इससे भी इस बिना उपायवाले विषयमें तू शोक करनेको योग्य नहीं है ॥२७ ॥ 


अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥


हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं , केवल बीचमें ही प्रकट हैं ; फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना है ? ॥ २८॥ 


आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । 

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 


कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्वका आश्चर्यकी भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्यकी भाँति सुनता है और कोई - कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता ॥२ ९॥ 


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । 

तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 


हे अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरों में सदा ही अवध्य है । इस कारण सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये तू शोक करनेके योग्य नहीं है ॥३० ॥


स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । 

धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ 


तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिये ; क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है ॥ ३१॥ 


यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ 


हे पार्थ ! अपने - आप प्राप्त हुए और खुले हुए 

स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकारके युद्धको भाग्यवान् क्षत्रिय लोग ही पाते हैं ॥३२॥ 


अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य सङ्ग्रामं न करिष्यसि । 

ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि । 


किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ॥३३ ॥ 


अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते 


तथा सब लोग तेरी बहुत कालतक रहनेवाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मरणसे भी बढ़कर है ॥३४॥ 


भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । 

येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ 


और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा , वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे ॥ ३५ ॥ 


अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।

निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् ॥ 


तेरे वैरीलोग तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत - से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे ; उससे अधिक दुःख और क्या होगा ? ॥ ३६ ॥ 


हतोवा प्राप्स्यसिस्वर्गजित्वा वा भोक्ष्यसेमहीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ 


या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा । इस कारण हे अर्जुन ! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा ॥३७॥ 


सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ 


जय - पराजय , लाभ - हानि और सुख - दुःखको समान समझकर , उसके बाद युद्ध के लिये तैयार हो जा ; इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पाप को नहीं प्राप्त होगा ॥ ३८ ॥ 


एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिोंगे त्विमां शृणु ।

बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥


हे पार्थ ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के ? विषयमें कही गयी और अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन - जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धनको भली भाँति त्याग देगा अर्थात् सर्वथा नष्ट कर डालेगा ॥३९॥ 


नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । 

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ 


इस कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है , बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्मका थोड़ा - सा भी साधन जन्म मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है ॥ ४० ॥


व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । 

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 


हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मि का बुद्धि एक ही होती है ; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं ।४१॥ 


यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । 

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ 

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । 

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ 


हे अर्जुन ! जो भोगोंमें तन्मय हो रहे हैं , जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं , जिनकी बुद्धिमें स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है - ऐसा कहनेवाले हैं , वे अविवेकीजन इस प्रकारकी जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणीको कहा करते हैं जो कि जन्मरूप कर्मफल देनेवाली एवं भोग तथा ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारकी बहुत - सी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है , उस वाणीद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है , जो भोग और ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं ; उन पुरुषोंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती ॥ ४२-४४ ॥ 


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्वैगुण्यो भवार्जुन । 

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥ 


हे अर्जुन ! वेद उपर्युक्त प्रकारसे तीनों गुणोंके कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनोंका प्रतिपादन करनेवाले हैं ; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनोंमें आसक्तिहीन , हर्ष - शोकादि द्वन्द्वोंसे रहित नित्यवस्तु परमात्मा में स्तिथ योग एवं क्षेम को न चाहनेवाला और स्वाधीन अन्तः - करणवाला हो ॥४५ ॥ 


यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । 

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ 


सब ओरसे परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है , ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है ॥४६॥ 


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । 

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ 


तेरा कर्म करने में ही अधिकार है , उसके फलों में कभी नहीं । इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो ॥४७ ॥ 


योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ 


हे धनञ्जय ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोको कर , समत्व * ही योग कहलाता है ॥४८ ॥ 


जो कुछ भी कर्म किया जाय उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में  समभाव रहनेका नाम ' समत्व ' है । 


दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । 

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा : फलहेतवः ॥ 


इस समत्वरूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है । इसलिये हे धनञ्जय ! तू समबुद्धिमें ही रक्षाका उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोगका ही आश्रय ग्रहण कर ; क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं ॥४ ९ ॥

अध्याय प्रथम 2

 गीताजी अध्याय अध्याय 1 

( श्लोक 24 - 47 )


सञ्जय उवाच  ( आगे का घटनाक्रम संजय धृतराष्ट्र को सुना रहे है ) 


एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ 

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । 

उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ 


संजय धृतराष्ट्र से बोलें ! महाराज अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा है, मेरे रथ को दोनो सेनाओं के बीचोबीच लेजाकर खड़ा कीजिये .....अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ ! युद्धके लिये जुटे हुए इन कौरवोंको देख ॥२४-२५॥


तत्रापश्यस्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ।।

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।


इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ - चाचोंको , दादों - परदादोंको , गुरुओं को , मामाओं को , भाइयों को , पुत्रोंको , पौत्रों को तथा मित्रों को , ससुरों को और सुहृदों को भी देखा ॥ 


तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् । 

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । 


उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले ॥ 


अर्जुन उवाच (अर्जुन श्री भगवान से कहते है )


दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ 

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । 

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।। 


अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमाञ्च हो रहा है ।। 


गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । 

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।। 


हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित - सा हो रहा है ; इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ ॥३० ॥ 


निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । 

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे । 


हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजनसमुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता ॥३१॥ 


नकाङ्क्षेक् विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । 

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।।


हे कृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखोंको ही । हे गोविन्द ! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवनसे भी क्या लाभ है ? अपने भाइयों को मारकर मुझे राजपाठ नही चाहिए ॥३२॥ 


येषामर्थे काङ्कितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । 

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।


हमें जिनके लिये राज्य , भोग और सुखादि अभीष्ट हैं , वे ही ये सब धन और जीवनकी आशाको त्यागकर युद्धमें खड़े हैं ॥३३॥ 


आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुला : श्वशुराः पौत्रा : श्याला : सम्बन्धिनस्तथा । 


गुरुजन , ताऊ - चाचे , लड़के और उसी प्रकार दादे , मामे , ससुर , पौत्र , साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं ॥३४ ॥ 


एतान्न हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन । 

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ 


हे मधुसूदन ! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्यके लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता ; फिर पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है ? ॥ ३५ ॥ 


निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याजनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।।


 हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी ? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा ॥३६॥ 


तस्मान्नाऱ्या वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ 


अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैं ; क्योंकि अपने ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे सुखी होंगे ? ॥३७॥ 


यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । 

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ 

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् । 

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन । 


यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पापको नहीं देखते , तो भी हे जनार्दन ! कुलके नाशसे उत्पन्न दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये ? ॥३८-३९॥ 


कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । 

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ 


कुलके नाशसे सनातन कुल - धर्म नष्ट हो जाते हैं , धर्म के नाश हो जानेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप भी बहुत फैल जाता है ॥ ४० ॥


अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । 

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥ 


हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियोंके दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ।।४१॥ 


सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । 

पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ 


वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है । लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रियावाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वञ्चित इनके पितरलोग भी अधोगतिको प्राप्त होते हैं ॥४२॥ 


दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ 


इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ 


उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । 

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ 


हे जनार्दन ! जिनका कुल - धर्म नष्ट हो गया है , ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित कालतक नरक में वास होता है , ऐसा हम सुनते आये हैं ॥


अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥


हा ! शोक ! हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं , जो राज्य और सुखके लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं ॥४५॥ 


यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । 

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥


यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करनेवाले को शस्त्र हाथ में लिये हुए धृतराष्ट्रके पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक होगा ॥४६॥ 


सञ्जय उवाच आगे का घटनाक्रम बताते हुए धृतराष्ट्र को बताते है .....


एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । 

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ 


संजय बोले - रणभूमिमें शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर , बाणसहित धनुषको त्यागकर रथके पिछले भागमें बैठ गये ॥४७ ॥ 


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१