Sunday, May 30, 2021

अध्याय अष्टम

 *श्रीगीताजी आठवां अध्याय* 


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं 

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । 

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ 


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।


*अथाष्टमोऽध्यायः* 


अर्जुन उवाच


*किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥* 


अर्जुनने कहा - हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत नामसे क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं ॥१ ॥ 


*अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥* 


हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है ? और वह इस शरीर में कैसे है ? तथा युक्तचित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाननेमें आते हैं ॥२ ॥ 


श्रीभगवानुवाच 


*अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्जितः॥* 


श्रीभगवान्ने कहा - परम अक्षर ' ब्रह्म ' है , अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा ' अध्यात्म ' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है , वह ' कर्म ' नाम से कहा गया है ॥ ३ ॥ 


*अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥* 


उत्पत्ति - विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं , हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीरमें मैं वासुदेव ही अन्तर्यामीरूपसे अधियज्ञ हूँ ॥४ ॥ 


*अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥* 


जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है , वह मेरे साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है - इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५॥ 


*यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥* 


हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस 


जिस भी भावको स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता है , उस - उसको ही प्राप्त होता है ; क्योंकि वह सदा उसी भावसे भावित रहा है ॥६ ॥ 


*तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥*


इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर । इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन - बुद्धिसे युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा ॥ ७ ॥


*अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥* 


हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योग से युक्त , दूसरी ओर न जाने वाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरुषको अर्थात् परमेश्वरको ही प्राप्त होता है ।॥ ८ ॥


*कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥* 


जो पुरुष सर्वज्ञ , अनादि , सबके नियन्ता , सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म , सबके धारण - पोषण करनेवाले अचिन्त्यस्वरूप , सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे , शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है॥९॥ 


*प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥*


वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके , फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है ॥१० ॥


*यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥*


वेदके जाननेवाले विद्वान् जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं , आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं , उस परमपदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा ॥११ ॥ 


*सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥*


सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके , फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राणको मस्तक में स्थापित करके , परमात्म सम्बन्धी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ' ॐ ' इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है , वह पुरुष परमगतिको प्राप्त होता है ॥

 १२-१३ ॥ 


*अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥*


हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है , उस नित्य - निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ , अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ॥ १४ ॥ 


*मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धि परमां गताः ॥*


परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते ॥ १५ ॥ 


*आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥*


हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्ती हैं , परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता ; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं ॥१६ ॥ 


*सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥*


ब्रह्माका जो एक दिन है , उसको एक हजार चतुर्युगीतक की अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं , वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैं ॥१७ ॥


*अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्जके ॥*


सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्मशरीर में ही लीन हो जाते हैं ॥ १८ ॥ 


*भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥*


हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो होकर प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता है ॥१ ९ ॥ 


*परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥*


उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्तभाव है , वह परम दिव्य पुरुष सब भूतोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता ॥ २० ॥


*अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥*


जो अव्यक्त ' अक्षर ' इस नामसे कहा गया है , उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते , वह मेरा परम धाम है ॥ २१ ॥ 


*पुरुषः स पर : पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥*


हे पार्थ ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत् परिपूर्ण है , वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है ॥ २२ ॥ 


*यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।*


हे अर्जुन ! जिस कालमें शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन तो वापस न लौटनेवाली गतिको और जिस कालमें गये हुए वापस लौटनेवाली गतिको ही प्राप्त होते हैं , उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको कहूँगा ॥ २३ ॥ 


*अग्निोतिरहः शुक्ल : षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥*


जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि - अभिमानी देवता है , दिनका अभिमानी देवता है , शुक्लपक्षका अभिमानी

देवता है और उत्तरायणके छ : महीनों का अभिमानी देवता है , उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाये जाकर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ 


*धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥* 


जिस मार्गमें धूमाभिमानी देवता है , रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्षका अभिमानी देवता है और दक्षिणायनके छः महीनोंका अभिमानी देवता है , उस मार्गमें मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगी उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले गया हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभकर्मोंका फल भोगकर वापस आता है ॥ २५ ॥ 


*शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥*

 क्योंकि जगत्के ये दो प्रकारके - शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक के द्वारा गया हुआ * -जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता , उस परम गतिको प्राप्त होता  है और दूसरे के द्वारा गया हुआ फिर वापस आता है अर्थात् जन्म - मृत्युको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥


*नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥*


हे पार्थ ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता । इस कारण हे अर्जुन ! तू सब कालमें समबुद्धि रूप योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर मेरी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाला हो ॥२७ ॥


*वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥* 


योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ , तप और दानादिके करनेमें जो पुण्यफल ककहा है , उन सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपदको प्राप्त होता है ॥२८ ॥ 


*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥*

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