Saturday, May 29, 2021

अध्याय सप्तम

 *श्रीगीताजी* सातवां अध्याय


*श्रीभगवान्ने छठे अध्याय के छियालीसवें श्लोकमें योगीकी महिमा कही और सैंतालीसवें श्लोकमें कहा कि योगियोंमें भी जो मुझमें श्रद्धा - प्रेम करके मेरा भजन करते हैं , वे भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं । भक्तोंको जैसे भगवान्की याद आती है तो वे उसमें तल्लीन हो जाते हैं - मस्त हो जाते हैं , ऐसे ही भगवान्के सामने भक्तोंका विशेष प्रसंग आता है तो भगवान् उसमें मस्त हो जाते हैं । इसी मस्तीमें सराबोर होते हुए भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही सातवें अध्यायका विषय अपनी तरफसे प्रारम्भ कर देते हैं ।*


*अथ सप्तमोऽध्यायः* 


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशंविश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।

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*श्रीभगवानुवाच* 


*मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥*


श्रीभगवान् बोले - हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति , बल , ऐश्वर्यादि गुणोंसे युक्त , सबके आत्मरूप मुझको संशय रहित जानेगा , उसको सुन ॥१॥ 


*ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥*  


मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा , जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेष नहीं रह जाता ॥ २ ॥ 


*मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥*


हजारों मनुष्योंमें कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्वसे अर्थात् यथार्थरूपसे जानता है ॥३॥ 


*भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥* 


पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , मन , बुद्धि और अहंकार भी इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति है । यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो ! इससे दूसरीको , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है , मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान ॥४-५ ॥ 


*एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥*


हे अर्जुन ! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत्का मूलकारण हूँ ॥ ६ ॥ 


*मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।*


हे धनञ्जय ! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् सूत्रमें सूत्रके मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है ॥ ७ ॥ 


*रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥*


हे अर्जुन ! मैं जल में रस हूँ , चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ , सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ , आकाश में शब्द और पुरुषोंमें पुरुषत्व हूँ ॥८॥ 


*पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥* 


मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध और अग्निमें तेज हूँ

तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियोंमें तप हूँ॥९॥ 


*बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥* 


हे अर्जुन ! तू सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मुझको ही जान । मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ ॥१० ॥ 


*बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।*


हे भरतश्रेष्ठ ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम हूँ ॥११॥ 


*ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥* 


और भी जो सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजोगुण से तथा तमोगुण से होने वाले भाव हैं , उन सबको तू ' मुझसे ही होनेवाले हैं ' ऐसा जान , परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं ॥ १२ ॥ 


*त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥* 


गुणोंके कार्यरूप सात्त्विक , राजस और तामस इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार प्राणि समुदाय मोहित हो रहा है , इसीलिये इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशीको नहीं जानता ॥१३॥


*दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥*


क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है ; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं , वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं ॥१४॥ 


*न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥*


मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर - स्वभावको धारण किये हुए , मनुष्योंमें नीच , दूषित कर्म करनेवाले मूढलोग मुझको नहीं भजते ॥१५॥ 


*चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।*


हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करने वाले

अर्थार्थी ' , आर्त ' , जिज्ञासु और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं ॥१६ ॥ 


*तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥*


उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम भक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है , क्योंकि मुझको तत्त्व से जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १७ ॥ 


*उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥* 


ये सभी उदार हैं , परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है - ऐसा मेरा मत है ; क्योंकि वह मद्गत मन - बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है ॥ १८ ॥ 


*बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥*


बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त

पुरुष , सब कुछ वासुदेव ही है - इस प्रकार मुझको भजता है , वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १ ९ ॥ 


*कामैस्तैस्तैर्हतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता : स्वया ।* 


उन - उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है , वे लोग अपने स्वभावसे प्रेरित होकर उस - उस नियमको धारण करके अन्य देवताओंको भजते हैं अर्थात् पूजते हैं ॥२०॥ 


*यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥*


जो - जो सकाम भक्त जिस - जिस देवताके स्वरूपको श्रद्धासे पूजना चाहता है , उस - उस भक्तकी श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ ॥२१॥ 


*स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥* 


वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवतासे मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगोंको निःसन्देह प्राप्त करता है ॥२२॥ 


*अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥*  


परन्तु उन अल्प बुद्धिवालोंका वह फल नाशवान् है तथा वे देवताओंको पूजनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें , अन्तमें वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥ 


*अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥*


बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भावको न जानते हुए मन - इन्द्रियोंसे परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्माको मनुष्यकी भाँति जन्मकर व्यक्तिभावको प्राप्त हुआ मानते हैं ॥२४ ॥ 


*नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥*


अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता , इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वरको नहीं जानता अर्थात् मुझको जन्मने - मरनेवाला समझता है ॥ २५ ॥ 


*वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥*


हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमानमें स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतोंको मैं जानता हूँ , परन्तु भारत मुझको कोई भी श्रद्धा - भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता ॥ २६ ॥ 


*इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥*


हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख - दुःखादि द्वन्द्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं ॥ २७ ॥ 


*येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥* 


परन्तु निष्कामभाव से श्रेष्ठ कर्मोंका आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है , वे राग द्वेषजनित द्वन्द्वरूप मोहसे मुक्त दृढनिश्चयी भक्त मुझको सब प्रकारसे भजते हैं ॥ २८॥ 


*जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्म चाखिलम् ॥* 


जो मेरे शरण होकर जरा और मरणसे छूटनेके लिये यत्न करते हैं , वे पुरुष उस ब्रह्मको , सम्पूर्ण अध्यात्मको , सम्पूर्ण कर्मको जानते हैं ॥ २ ९ ॥ 


*साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥*


जो पुरुष अधिभूत और अधिदैवके सहित तथा अधियज्ञके सहित ( सबका आत्मरूप ) मुझे अन्तकालमें भी जानते हैं , वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात् प्राप्त हो जाते हैं ॥ ३० ॥ ॐ 


*तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥*

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