॥श्रीपरमात्मने नमः॥ ( *गीताजी प्रथम अध्याय*)
श्लोक 1-23 ( हिंदी संस्कृत अनुवाद सहित )
*श्रीमद्भगवद्गीता अथ प्रथमोऽध्यायः*
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*धृतराष्ट्र उवाच* ( धृतराष्ट्र संजय से --)
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥
धृतराष्ट्र बोले - हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें एकत्रित , युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया ? ॥१॥
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सञ्जय उवाच (संजय धृतराष्ट्र को उत्तर देते है)
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥
संजय धृतराष्ट्र को आंखों देखा हाल सुनाते हुए कहते है - "उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा ॥२॥
(चूंकि दुर्योधन राजा है, एवं द्रोणाचार्य उनकी सेना के प्रमुख अंग, अतः राजा अपने मुख्य योद्धा से यही तो कहेगा .... )
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*दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है*
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥
हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेनाको देखिये ॥३॥
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥
इस सेनामें बड़े - बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद , धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज , पुरुजित् , कुन्तिभोज और मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्य , पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा , सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र - ये सभी महारथी हैं ॥ ४–६ ॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं , उनको आप समझ लीजिये । आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के जो - जो सेनापति हैं , उनको बतलाता हूँ ॥७॥
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ।
आप - द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा , विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा ॥८ ॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥
और भी मेरे लिये जीवनकी आशा त्याग देनेवाले बहुत - से शूरवीर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित और सब - के - सब युद्ध में चतुर हैं ॥ ९ ॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन लोगोंकी यह सेना जीतने में सुगम है ॥१०॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥
इसलिये सब मोर्चोंपर अपनी - अपनी जगह स्थित रहते हुए आपलोग सभी नि : सन्देह भीष्मपितामह की ही सब ओरसे रक्षा करें ॥११॥
(दुर्योधन अपनी सेंनिक शक्ति देखकर पूर्ण रूप से आश्वस्त है, की महाभारत का यह रण वही जीतेगा )
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*अब युद्ध मे सभी योद्धाओ द्वारा शंखनाद हो रहा है*
तस्य सञ्जनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ॥.
कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वरसे सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया ॥ १२ ॥
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥
इसके पश्चात् शंख और नगारे तथा ढोल , मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे । उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ ॥१३॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥
इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाये ॥१४॥
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः ॥
श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्यनामक , अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेनने पौण्ड्रनामक महाशंख बजाया ॥१५॥
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ।।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजयनामक और नकुल तथा सहदेवने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये ॥१६॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥
श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि , राजा द्रुपद एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु - इन सभीने , हे राजन् ! सब ओरसे अलग - अलग शंख बजाये ॥ १७-१८ ॥
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥
और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात् आपके पक्षवालोंके हृदय विदीर्ण कर दिये ॥१९॥
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
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युद्ध का शंखनाद सब ओर से हो चुका है । तब अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते है :- ( यह घटना संजय धृतराष्ट्र को सुना रहे है )
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥
हे राजन् ! इसके बाद कपिध्वज अर्जुनने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र - सम्बन्धियोंको देखकर , उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा - हे अच्युत ! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीचमें खड़ा कीजिये॥२०-२१ ॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिरणसमुद्यमे ॥
और जब तक कि मैं युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख लूँ कि इस युद्धरूप व्यापार में मुझे किन - किनके साथ युद्ध करना योग्य है तबतक उसे खड़ा रखिये ॥२२॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥
दुर्बुद्धि दुर्योधनका युद्ध में हित चाहनेवाले जो जो ये राजा लोग इस सेनामें आये हैं , इन युद्ध करनेवालोंको मैं देखूगा॥२३॥
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आगे के अध्याय में आप अर्जुन का वह रूप देखेंगे, जिस कारण श्रीकृष्ण विराट रूप लेते हुए श्रीभगवतगीताजी का ज्ञान अर्जुन को दिया था .....
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