*श्रीभगवतगीता* -
*अथ द्वितीयोऽध्याय्*
श्लोक ( 1 से 49 )
( श्रीगीताजी का एक एक शब्द श्रीभगवान की दिव्य वाणी है, इन्हें पढ़ने का मौका हमे, ज् जाने कितने पुण्यों के बाद मिलता है)
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
संजय धृतराष्ट्र को श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद सुना रहे है--
की जब अर्जुन मधुसूदन कृष्ण से कहा की वह अपने भाइयों को नही मार सकता तब ---उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा ॥१ ॥
श्रीभगवानुवाच ( भगवान अर्जुन से कहते है -)
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वय॑मकीर्तिकरमर्जुन
श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित है , न स्वर्गको देनेवाला है और न कीर्ति को करनेवाला ही है ॥२॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
इसलिये हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो , तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती । हे परंतप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो जा ॥३॥ II
अर्जुन उवाच ( अर्जुन पुनः श्रीभगवान से कहते है )
कथं भीष्ममहं सख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाह्नवरिसूदन ॥
अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड्गा ? क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनों ही पूजनीय हैं ॥४ ॥
गुरूनहत्वा हि महानुभावा ञ्छ्रेयो
भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगाधिरप्रदिग्धान् ॥
इसलिये इन महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं इस लोकमें भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याण कारक समझता हूँ ; क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूंगा ॥५ ॥
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये युद्ध करना और न करना - इन दोनों में से कौन - सा श्रेष्ठ है , अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे । और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते , वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्रके पुत्र हमारे मुकाबलेमें खड़े हैं ॥६ ॥
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।
इसलिये कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो , वह मेरे लिये कहिये ; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ , इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये ॥७॥
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या
द्यच्छो च्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक , धन - धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामी पने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ , जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके ॥८ ॥
सञ्जय उवाच ( यही सब बातें संजय सुन रहे है, ओर धृतराष्ट्र को बता भी रहें है )
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥
संजय बोले - हे राजन् ! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अन्तर्यामी श्रीकृष्णमहाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्दभगवान्से ' युद्ध नहीं करूँगा ' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये ॥९ ॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र ! अन्तर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओंके बीचमें शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए - से यह वचन बोले ॥१० ॥
श्रीभगवानुवाच ( श्रीभगवान ने अर्जुन से कहा )
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
श्रीभगवान् बोले - हे अर्जुन !
तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिये शोक करता है और पण्डितोंके - से वचनों को कहता है ; परंतु जिनके प्राण चले गये हैं , उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते ॥११॥
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था , तू नहीं था अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे ॥१२॥
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र न मुह्यति ॥
जैसे जीवात्माकी इस देह में बालकपन , जवानी और वृद्धावस्था होती है , वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है ; उस विषयमें धीर पुरुष मोहित नहीं होता ॥१३ ॥
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
हे कुन्तीपुत्र ! सर्दी - गर्मी और सुख - दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति विनाशशील और अनित्य हैं , इसलिये हे भारत ! उनको तू सहन कर ॥१४॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख - सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते , वह मोक्ष के योग्य होता है ॥१५॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है । इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है ॥१६॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥
नाशरहित तो तू उसको जान , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् - दृश्यवर्ग व्याप्त है । इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है ॥ १७ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥
इस नाशरहित , अप्रमेय , नित्यस्वरूप जीवात्माके ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं । इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! तू युद्ध कर ॥१८ ॥
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
जो इस आत्माको मारने वाला समझता है तथाजो इसको मरा मानता है , वे दोनों ही नहीं जानते ; क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है ॥१९॥
न जायते म्रियते वा कदाचि
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है ; क्योंकि यह अजन्मा , नित्य , सनातन और पुरातन है ; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता ॥२०॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥
हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित , नित्य , अजन्मा और अव्यय जानता है , वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है ? ॥२१ ॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
जैसे । मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है , वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरोंको त्यागकर दूसरे नये शरीरोंको प्राप्त होता है ॥ २२॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते , इसको आग नहीं जला सकती , इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता ॥२३॥
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है , यह आत्मा अदाह्य , अक्लेद्य और निःसन्देह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य , सर्वव्यापी , अचल , स्थिर रहनेवाला और सनातन है ॥ २४॥
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
यह आत्मा अव्यक्त है , यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकार रहित कहा जाता है । इससे हे अर्जुन ! इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे जानकर तू शोक करनेको योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है ॥२५ ॥
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥
किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो , तो भी हे महाबाहो ! तू इस प्रकार शोक करनेको योग्य नहीं है ॥२६ ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु वं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
क्योंकि इस मान्यताके अनुसार जन्मे हुएकी मृत्यु निश्चित है और मरे हुएका जन्म निश्चित है । इससे भी इस बिना उपायवाले विषयमें तू शोक करनेको योग्य नहीं है ॥२७ ॥
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं , केवल बीचमें ही प्रकट हैं ; फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना है ? ॥ २८॥
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥
कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्वका आश्चर्यकी भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्यकी भाँति सुनता है और कोई - कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता ॥२ ९॥
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
हे अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीरों में सदा ही अवध्य है । इस कारण सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये तू शोक करनेके योग्य नहीं है ॥३० ॥
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिये ; क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है ॥ ३१॥
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥
हे पार्थ ! अपने - आप प्राप्त हुए और खुले हुए
स्वर्ग के द्वाररूप इस प्रकारके युद्धको भाग्यवान् क्षत्रिय लोग ही पाते हैं ॥३२॥
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ॥३३ ॥
अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते
तथा सब लोग तेरी बहुत कालतक रहनेवाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मरणसे भी बढ़कर है ॥३४॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा , वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे ॥ ३५ ॥
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् ॥
तेरे वैरीलोग तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए तुझे बहुत - से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे ; उससे अधिक दुःख और क्या होगा ? ॥ ३६ ॥
हतोवा प्राप्स्यसिस्वर्गजित्वा वा भोक्ष्यसेमहीम् । तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥
या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा । इस कारण हे अर्जुन ! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा ॥३७॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
जय - पराजय , लाभ - हानि और सुख - दुःखको समान समझकर , उसके बाद युद्ध के लिये तैयार हो जा ; इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पाप को नहीं प्राप्त होगा ॥ ३८ ॥
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिोंगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥
हे पार्थ ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के ? विषयमें कही गयी और अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन - जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धनको भली भाँति त्याग देगा अर्थात् सर्वथा नष्ट कर डालेगा ॥३९॥
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
इस कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है , बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्मका थोड़ा - सा भी साधन जन्म मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है ॥ ४० ॥
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मि का बुद्धि एक ही होती है ; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं ।४१॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
हे अर्जुन ! जो भोगोंमें तन्मय हो रहे हैं , जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं , जिनकी बुद्धिमें स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है - ऐसा कहनेवाले हैं , वे अविवेकीजन इस प्रकारकी जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणीको कहा करते हैं जो कि जन्मरूप कर्मफल देनेवाली एवं भोग तथा ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारकी बहुत - सी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है , उस वाणीद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है , जो भोग और ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं ; उन पुरुषोंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती ॥ ४२-४४ ॥
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्वैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥
हे अर्जुन ! वेद उपर्युक्त प्रकारसे तीनों गुणोंके कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनोंका प्रतिपादन करनेवाले हैं ; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनोंमें आसक्तिहीन , हर्ष - शोकादि द्वन्द्वोंसे रहित नित्यवस्तु परमात्मा में स्तिथ योग एवं क्षेम को न चाहनेवाला और स्वाधीन अन्तः - करणवाला हो ॥४५ ॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
सब ओरसे परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है , ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है ॥४६॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है , उसके फलों में कभी नहीं । इसलिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो ॥४७ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
हे धनञ्जय ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोको कर , समत्व * ही योग कहलाता है ॥४८ ॥
जो कुछ भी कर्म किया जाय उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहनेका नाम ' समत्व ' है ।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा : फलहेतवः ॥
इस समत्वरूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है । इसलिये हे धनञ्जय ! तू समबुद्धिमें ही रक्षाका उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोगका ही आश्रय ग्रहण कर ; क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं ॥४ ९ ॥
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