*श्रीभगवतगीता* ( छठा अध्याय )
पाँचवें अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने यह बात पूछी थी कि *सांख्ययोग और कर्मयोग - इन दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है ?*
इसके उत्तर में भगवान्ने कहा कि ये दोनों ही कल्याण करने वाले हैं ; परन्तु कर्मसंन्यास और कर्मयोग - *इन दोनोंमें कर्मयोग श्रेष्ठ* है - ' *तयोस्तु कर्मसन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ' ( ५।२ ) ।*
अब दोनों कल्याण करने वाले कैसे हैं - इसका वर्णन भगवान्ने पाँचवें अध्याय के छब्बीस वें श्लोक तक किया । फिर सांख्ययोग तथा कर्मयोगके लिये उपयोगी और स्वतन्त्रतासे कल्याण करनेवाले ध्यानयोगका संक्षेपसे दो श्लोकोंमें वर्णन किया तथा अन्तमें अपनी ही तरफसे भक्तिकी निष्ठा बताकर पाँचवें अध्यायके विषयका उपसंहार किया ।
*अब पुनः कर्मयोग की श्रेष्ठता बतानेके लिये भगवान् छठे अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं* ।
*अथ ध्यानम्*
( गीताजी के पाठ से पहले इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए
*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*
अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ ।
*यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥*
अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है ।
*वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥*
अर्थ - कंस और चाणूर का वध करने वाले , देवकी के आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।
________________________
*श्रीभगवानुवाच*
*अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥*
श्री भगवान् बोले - जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है , वह भी संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करनेवाला योगी नहीं है ॥ १ ॥
*यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥*
हे अर्जुन ! जिसको संन्यास ' ऐसा कहते हैं , उसी को तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता ॥२ ॥
*आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥*
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मनन शील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है , वही कल्याण में हेतु कहा जाता है ॥ ३ ॥
*यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥*
जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है , उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है ॥ ४ ॥
*उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥*
अपने द्वारा अपना संसार - समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले ; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ॥५ ॥
*बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥*
जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है , उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है , उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुता में बर्तता है ॥६॥
*जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥*
सरदी - गरमी और सुख - दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्त : करणकी वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं , ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित है अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं ॥७ ॥
*ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥*
जिसका अन्त : करण ज्ञान - विज्ञानसे तृप्त है , जिसकी स्थिति विकाररहित है , जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी , पत्थर और सुवर्ण समान हैं , वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है , ऐसे कहा जाता है ॥८ ॥
*सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥*
सुहृद् , मित्र , वैरी , उदासीन , मध्यस्थ , द्वेष्य और बन्धुगणोंमें , धर्मात्माओंमें और पापियोंमें भी समान भाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥
*योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥*
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वशमें रखने वाला , आशारहित और संग्रह रहित योगी अकेला ही एकान्त स्थानमें स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मा में लगावे ॥१० ॥
*शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥*
शुद्ध भूमि में , जिसके ऊपर क्रमश : कुशा , मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं , जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा , ऐसे अपने आसनको स्थिर स्थापन करके -॥११ ॥
*तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥*
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वशमें रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्त : करणकी शुद्धिके लिये योग का अभ्यास करे ॥१२ ॥
*समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥*
काया , सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर , अपनी नासिकाके अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर , अन्य दिशाओं को न देखता हुआ- ॥१३ ॥
*प्रशान्तात्माविगत भीब्रह्मचारिखते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥*
ब्रह्मचारीके व्रत में स्थित , भयरहित तथा भलीभाँति शान्त अन्त : करण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे ॥१४॥
*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्ति निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥*
वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता हुआ मुझमें रहनेवाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्तिको प्राप्त होता है ॥१५॥
*नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्रतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।*
हे अर्जुन ! यह योग न तो बहुत खाने वालेका , न बिलकुल न खानेवालेका , न बहुत शयन करनेके स्वभाववालेका और न सदा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है ॥ १६ ॥
*युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥*
दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार - विहार करनेवालेका , कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवाले का ही सिद्ध होता है ॥ १७ ॥
*यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥*
अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है , उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है , ऐसा कहा जाता है ॥ १८ ॥
*यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥*
जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलाय मान नहीं होता , वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तकी कही गयी है ॥१ ९ ॥
*यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥*
योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही सन्तुष्ट रहता है ॥२० ॥
*सुखमात्यन्तिकं यत्तबुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।*
इन्द्रियोंसे अतीत , केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द है ; उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूपसे विचलित होता ही नहीं ॥ २१ ॥
*यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥*
परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता ॥ २२ ।।
*तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥*
जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है ; उसको जानना चाहिये । वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसे निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है ॥ २३ ॥
*सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥*
संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को नि:शेषरूप से त्यागकर और मन के द्वारा इन्द्रियोंके समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर- ॥२४ ॥
*शनैः शनैरुपरमेबुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥*
क्रम - क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे ॥ २५ ॥
*यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥*
यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे संसारमें विचरता है , उस - उस विषयसे रोककर यानी हटाकर इसे बार - बार परमात्मामें ही निरुद्ध करे ॥ २६ ॥
*प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥*
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है , जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है , ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है ॥ २७ ॥
*युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥*
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनुभव करता है ॥२८ ॥
*सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥*
सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है ॥ २ ९ ॥
*यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥*
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत देखता है , उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ॥ ३० ॥
*सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥*
जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है , वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है ॥ ३१ ॥
*आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥*
हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दु : खको भी सबमें सम देखता है , वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है ॥ ३२ ॥
*अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥*
अर्जुन बोले - हे मधुसूदन ! जो यह योग आपने समभावसे कहा है , मनके चञ्चल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ ॥ ३३ ॥
*चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥*
क्योंकि हे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा चञ्चल , प्रमथन स्वभाववाला , बड़ा दृढ़ और बलवान् है । इसलिये उसका वशमें करना मैं वायुको रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ ॥ ३४ ॥
*श्रीभगवानुवाच*
*असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥*
श्रीभगवान् बोले - हे महाबाहो ! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनता से वशमें होनेवाला है ; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें हो जाता है ॥३५ ॥
*असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥*
जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है , ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है - यह मेरा मत है ॥ ३६ ॥
*अर्जुन उवाच*
*अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥*
अर्जुन बोले - हे श्रीकृष्ण ! जो योग में श्रद्धा रखनेवाला है ; किन्तु संयमी नहीं है , इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥
*कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥*
हे महाबाहो ! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रय रहित पुरुष छिन्न - भिन्न बादल की भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता ? ॥ ३८ ॥
*एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥*
हे श्रीकृष्ण ! मेरे इस संशयको सम्पूर्णरूपसे छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं , क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है ॥ ३ ९ ॥
*श्रीभगवानुवाच*
*पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति ॥*
श्रीभगवान् बोले - हे पार्थ ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही । क्योंकि हे प्यारे ! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता ॥ ४० ॥
*प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती : समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥*
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर , उनमें बहुत वर्षांतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है ॥ ४१ ॥
*अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥*
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है । परन्तु इस प्रकारका जो यह जन्म है , सो संसारमें निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है ॥४२ ॥
*तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥*
वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि संयोग को अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है ।
*पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥*
वह श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निःसन्देह भगवान्की ओर आकर्षित किया जाता है , तथा समबुद्धिरूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मोके फल को उल्लंघन कर जाता है ॥४४ ॥
*प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥*
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो फिर तत्काल ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है ।४५॥
*तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥*
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है , शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करनेवालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है ; इससे हे अर्जुन ! तू योगी हो ॥ ४६ ॥
*योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥*
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है , वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है ॥४७ ॥
*ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥*
No comments:
Post a Comment