गीताजी अध्याय अध्याय 1
( श्लोक 24 - 47 )
सञ्जय उवाच ( आगे का घटनाक्रम संजय धृतराष्ट्र को सुना रहे है )
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥
संजय धृतराष्ट्र से बोलें ! महाराज अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा है, मेरे रथ को दोनो सेनाओं के बीचोबीच लेजाकर खड़ा कीजिये .....अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ ! युद्धके लिये जुटे हुए इन कौरवोंको देख ॥२४-२५॥
तत्रापश्यस्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ।।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ - चाचोंको , दादों - परदादोंको , गुरुओं को , मामाओं को , भाइयों को , पुत्रोंको , पौत्रों को तथा मित्रों को , ससुरों को और सुहृदों को भी देखा ॥
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले ॥
अर्जुन उवाच (अर्जुन श्री भगवान से कहते है )
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।।
अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! युद्धक्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमाञ्च हो रहा है ।।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।।
हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित - सा हो रहा है ; इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ ॥३० ॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।
हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजनसमुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता ॥३१॥
नकाङ्क्षेक् विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।।
हे कृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखोंको ही । हे गोविन्द ! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवनसे भी क्या लाभ है ? अपने भाइयों को मारकर मुझे राजपाठ नही चाहिए ॥३२॥
येषामर्थे काङ्कितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।
हमें जिनके लिये राज्य , भोग और सुखादि अभीष्ट हैं , वे ही ये सब धन और जीवनकी आशाको त्यागकर युद्धमें खड़े हैं ॥३३॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुला : श्वशुराः पौत्रा : श्याला : सम्बन्धिनस्तथा ।
गुरुजन , ताऊ - चाचे , लड़के और उसी प्रकार दादे , मामे , ससुर , पौत्र , साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं ॥३४ ॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
हे मधुसूदन ! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्यके लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता ; फिर पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है ? ॥ ३५ ॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याजनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।।
हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी ? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा ॥३६॥
तस्मान्नाऱ्या वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैं ; क्योंकि अपने ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे सुखी होंगे ? ॥३७॥
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।
यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पापको नहीं देखते , तो भी हे जनार्दन ! कुलके नाशसे उत्पन्न दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये ? ॥३८-३९॥
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥
कुलके नाशसे सनातन कुल - धर्म नष्ट हो जाते हैं , धर्म के नाश हो जानेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप भी बहुत फैल जाता है ॥ ४० ॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥
हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियोंके दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ।।४१॥
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥
वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है । लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रियावाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वञ्चित इनके पितरलोग भी अधोगतिको प्राप्त होते हैं ॥४२॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥
इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥
हे जनार्दन ! जिनका कुल - धर्म नष्ट हो गया है , ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित कालतक नरक में वास होता है , ऐसा हम सुनते आये हैं ॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
हा ! शोक ! हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं , जो राज्य और सुखके लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं ॥४५॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करनेवाले को शस्त्र हाथ में लिये हुए धृतराष्ट्रके पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक होगा ॥४६॥
सञ्जय उवाच आगे का घटनाक्रम बताते हुए धृतराष्ट्र को बताते है .....
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
संजय बोले - रणभूमिमें शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर , बाणसहित धनुषको त्यागकर रथके पिछले भागमें बैठ गये ॥४७ ॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१
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