Saturday, May 29, 2021

गीता रहस्य

 *श्रीगीताजी की महिमा* 


                      ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥


अगर भगवान श्रीहरि की कृपा मुझपर बनी रही, तो मैं रौजाना अपने सभी सोशल मीडिया साइट्स पर श्रीगीताजी का एक अध्याय नियमित रूप से आपको पढ़ाऊंगा ।। श्रीगीताजी भगवान विष्णु के वचन है, इससे श्रेष्ठ इस संसार में और क्या हो सकता है ??


श्रीगीताजी जब भी आप पढ़ें । उससे पहले ध्यान आदि की क्रिया भी करें ।। वही सब इस पोस्ट में मैने लिखा है।। अतः पहला अध्याय शुरू करने से पहले , आप यह लेख अवश्य पढ़ लेवें, क्यो की यह लेख आपके रौज काम आएगा ।

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वास्तवमें श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य वाणी द्वारा वर्णन करने के लिये किसी की भी सामर्थ्य नहीं है ; क्योंकि यह एक परम रहस्यमय ग्रन्थ है । 


इसमें सम्पूर्ण वेदोंका सार - सार संग्रह किया गया है । इसकी संस्कृत इतनी सुन्दर और सरल है कि थोड़ा अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है ; परन्तु इसका आशय इतना गम्भीर है कि आजीवन निरन्तर अभ्यास करते रहनेपर भी उसका अन्त नहीं आता । 


प्रतिदिन नये - नये भाव उत्पन्न होते रहते हैं , इससे यह सदैव नवीन बना रहता है एवं एकाग्रचित्त होकर श्रद्धा - भक्तिसहित विचार करनेसे इसके पद - पदमें परम रहस्य भरा हुआ प्रत्यक्ष प्रतीत होता है । 


भगवान के गुण , प्रभाव और मर्म का वर्णन जिस प्रकार इस गीताशास्त्र में किया गया है , वैसा अन्य ग्रन्थों में मिलना कठिन है ; क्योंकि प्रायः ग्रन्थोंमें कुछ - न - कुछ सांसारिक विषय मिला रहता है ।


भगवान्ने ' श्रीमद्भगवद्गीता ' रूप एक ऐसा अनुपमेय शास्त्र कहा है कि जिसमें एक भी शब्द सदुपदेशसे खाली नहीं है । श्रीवेदव्यासजी ने महाभारतमें गीताजीका वर्णन करनेके उपरान्त कहा है :-


*गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । 

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥*


गीता सुगीता करने योग्य है अर्थात् श्रीगीताजीको भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भावसहित अन्त : करणमें धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है , जो कि स्वयं पद्मनाभ भगवान् श्रीविष्णुके मुखारविन्दसे निकली हुई है ; ( फिर ) अन्य शास्त्रोंके विस्तारसे क्या प्रयोजन है ? 


स्वयं श्रीभगवान ने भी इसके माहात्म्यका वर्णन किया है ( अ ० १८ श्लोक ६८ से ७१ तक ) । इस गीताशास्त्र में मनुष्यमात्र का अधिकार है , *चाहे वह किसी भी वर्ण , आश्रम में स्थित हो ; परंतु भगवान में श्रद्धालु और भक्तियुक्त अवश्य होना चाहिये ; क्योंकि भगवान  अपने भक्तों में ही इसका प्रचार करनेके लिये आज्ञा दी है तथा यह भी कहा है कि स्त्री , वैश्य , शूद्र और पापयोनि भी मेरे  परायण होकर परमगतिको प्राप्त होते हैं ( अ ० ९ श्लोक ३२ ) 


अपने - अपने स्वाभाविक कर्मो द्वारा मेरी पूजा करके मनुष्य परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं ( अ ० १८ श्लोक ४६ ) इन सब पर विचार करनेसे यही ज्ञात होता है कि परमात्माकी प्राप्तिमें सभीका अधिकार है ।


अथ ध्यानम् ( गीताजी के पाठ से पहले रौजाना आपको इन मन्त्रो के द्वारा भगवान श्रीविष्णु/वासुदेव/कृष्ण का ध्यान करना चाहिए


*शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् । 

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं 

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*


अर्थ - जिनकी आकृति अतिशय शान्त है , जो शेषनागकी शय्यापर शयन किये हुए हैं , जिनकी नाभि में कमल है , जो देवताओंके भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं , जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं , नील मेघ के समान जिनका वर्ण है , अतिशय सुन्दर जिनके सम्पूर्ण अंग हैं , जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं , जो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं , जो जन्म - मरणरूप भयका नाश करनेवाले हैं , ऐसे लक्ष्मीपति , कमलनेत्र भगवान् श्रीविष्णुको मैं ( सिरसे ) प्रणाम करता हूँ । 


यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥


अर्थ - ब्रह्मा , वरुण , इन्द्र , रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं , सामवेदके गानेवाले अंग , पद , क्रम और उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते हैं , योगीजन ध्यानमें स्थित तद्गत हुए मनसे जिनका दर्शन करते हैं , देवता और असुरगण ( कोई भी ) जिनके अन्तको नहीं जानते , उन ( परमपुरुष नारायण ) देवके लिये मेरा नमस्कार है । 


वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । 

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ 


अर्थ - कंस और चाणूरका वध करनेवाले , देवकीके आनन्दवर्द्धन , वसुदेवनन्दन , जगद्गुरु श्रीकृष्णचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ ।


*गीता - माहात्म्य*


जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर प्रेमपूर्वक इस पवित्र गीताशास्त्रका पाठ करता है , वह भय और शोक आदिसे रहित होकर विष्णुधाम को प्राप्त कर लेता है ॥१॥ 


जो मनुष्य सदा गीता का पाठ करने वाला है तथा प्राणायाम में तत्पर रहता है , उसके इस जन्म और पूर्वजन्म में किये हुए समस्त पाप निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं ॥२॥


जल में प्रतिदिन किया हुआ स्नान मनुष्योंके केवल शारीरिक मल का नाश करता है , परंतु गीताज्ञान रूप जलमें एक बार भी किया हुआ स्नान संसार - मलको नष्ट करनेवाला है ॥३॥ 


जो साक्षात् कमलनाभ भगवान् विष्णुके मुखकमल से प्रकट हुई है , उस गीताका ही भली भाँति गान ( अर्थसहित स्वाध्याय ) करना चाहिये , अन्य शास्त्रोंके विस्तारसे क्या प्रयोजन है ॥४ ॥ 


जो महाभारतका अमृतोपम सार है तथा जो भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे प्रकट हुआ है , उस गीतारूप गंगाजलको पी लेनेपर पुन : इस संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता ॥५॥ 


सम्पूर्ण उपनिषदें गौ के समान हैं , गोपालनन्दन श्रीकृष्ण दुहनेवाले हैं , अर्जुन बछड़ा है तथा महान् गीतामृत ही उस गौका दुग्ध है और शुद्ध बुद्धिवाला श्रेष्ठ मनुष्य ही इसका भोक्ता है ॥६॥ 


देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका कहा हुआ गीताशास्त्र ही एकमात्र उत्तम शास्त्र है , भगवान् देवकीनन्दन ही एकमात्र महान् देवता हैं , उनके नाम ही एकमात्र मन्त्र हैं और उन भगवान की सेवा ही एकमात्र कर्तव्य कर्म है ॥७ ॥

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